कसाईखाने से गायों को छुड़ाकर 1922 में हुई श्रीकृष्ण गोशाला की स्थापना

104 वर्ष पुरानी संस्था की जमीन पर बना अंतरराज्यीय बस पड़ाव, कुछ भूमि पर अतिक्रमण
104 वर्ष पुरानी संस्था की जमीन पर बना अंतरराज्यीय बस पड़ाव, कुछ भूमि पर अतिक्रमण पीयूष तिवारी, गढ़वा गढ़वा शहर के बस स्टैंड के पास श्रीकृष्ण गोशाला की स्थापना वर्ष 1922 में की गयी थी. बताया जाता है कि रामधनी पासी, भरत मिश्र और जगन्नाथ मिश्र सहित अन्य लोगों ने पहल कर कसाईखाने से कुछ गायों को छुड़ाकर इसकी शुरुआत की थी. गोशाला के लिए कुछ जमीन दान में ली गयी, जबकि कुछ जमीन खरीदी गयी थी. इस प्रकार यह गोशाला लगभग 104 वर्ष पुरानी हो चुकी है. वर्तमान में इसकी कुछ जमीन पर अतिक्रमण हो चुका है और कुछ मामले अदालत में लंबित हैं. इसी गोशाला की जमीन पर श्रीकृष्ण अंतरराज्यीय बस पड़ाव का निर्माण किया गया है. इसके अलावा करीब आठ से नौ एकड़ जमीन शहर से सटे चेतना गांव में भी स्थित है. बताया जाता है कि गोशाला की जमीन पर ही वर्ष 1927 में प्रमोद संस्कृत विद्यालय का निर्माण कराया गया था. कुछ वर्ष पहले राज्य सरकार ने इस विद्यालय को बंद कर दिया. इसके बाद सांसद निधि से बने कमरों का उपयोग गौशाला समिति के कार्यालय के रूप में किया जा रहा है. वर्ष 1951 तक प्रमोद संस्कृत विद्यालय और श्रीकृष्ण गौशाला एक ही प्रबंधन समिति के अधीन संचालित होते थे, लेकिन विद्यालय को सरकारी मान्यता दिलाने के उद्देश्य से बाद में दोनों संस्थाओं को अलग कर दिया गया. गढ़वा में आजादी के पहले हुई थी श्रीकृष्ण पुस्तकालय की स्थापना – जिला बनने के 35 वर्ष बाद भी अनुमंडल स्तर की सुविधा, अनुदान से हो रहा संचालन – 2011 तक पुराने जर्जर भवन में संचालित होता रहा पुस्तकालय गढ़वा को जिला बने 35 वर्ष से अधिक समय बीत चुका है, लेकिन यहां आज भी पुस्तकालय की सुविधा अनुमंडल स्तर की ही है और इसका संचालन अनुदान के सहारे हो रहा है. गढ़वा थाना के पास अपने सरकारी भवन में संचालित श्रीकृष्ण अनुमंडलीय पुस्तकालय में प्रतिदिन काफी संख्या में विद्यार्थी अध्ययन करने पहुंचते हैं. इस पुस्तकालय की स्थापना आजादी से पहले वर्ष 1926 में की गयी थी. बाद में सरकार ने इसे अनुमंडलीय पुस्तकालय के रूप में मान्यता दी गयी. इसकी शुरुआत शहर के बीच स्थित खादी बाजार मैदान के एक कमरे से की गयी थी. प्रारंभ में यह पुस्तकालय निजी खर्च पर चलाया जाता था. पुस्तकालय की स्थापना में रामदयालु पांडेय की प्रमुख भूमिका रही, जिसके कारण इसे शुरुआत में रामदयालु पुस्तकालय भी कहा जाता था. इसके अलावा दशरथ लाल केसरी, डॉ पदुम लाल, ललन प्रसाद और गोपाल प्रसाद सहित करीब 10 लोगों का महत्वपूर्ण योगदान रहा. जगदेव प्रसाद केसरी लंबे समय तक इस पुस्तकालय में लाइब्रेरियन के पद पर कार्यरत रहे. उन्हें वर्ष 1944 में अवैतनिक रूप से नियुक्त किया गया था और वर्ष 1998 में वे सेवानिवृत्त हुए. वर्ष 2008 में अपने निधन तक वे पुस्तकालय की देखरेख करते रहे. आजादी के बाद सरकार ने इसे श्रीकृष्ण अनुमंडलीय पुस्तकालय का दर्जा दिया और अनुदान देना शुरू किया. खादी बाजार स्थित पुराना भवन समय के साथ जर्जर हो गया था और उसके गिरने का खतरा पैदा हो गया था. वर्ष 2011 में सरकार ने नया भवन बनवाकर पुस्तकालय को थाना के पास वर्तमान स्थान पर स्थानांतरित कर दिया.
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