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10 साल की माही की धाराप्रवाह कन्नड़ देख देश हैरान

गढ़वा की बेटी ने बेंगलुरु में जीता दिल, मिल रही राष्ट्रीय स्तर सुर्खियां

गढ़वा की बेटी ने बेंगलुरु में जीता दिल, मिल रही राष्ट्रीय स्तर सुर्खियां गढ़वा. आज जब देश के विभिन्न हिस्सों से भाषाई मतभेद और विवाद की खबरें अक्सर सुर्खियों में रहती हैं, उसी बीच झारखंड के गढ़वा जिले की एक नन्हीं बेटी ने अपनी भाषाई सहजता से राष्ट्रीय स्तर पर लोगों का ध्यान खींचा है. गढ़वा के बलियारी (चोका) की रहने वाली 10 वर्षीय मृगांका अभिषेक उर्फ माही का एक वीडियो इन दिनों सोशल मीडिया पर जबरदस्त तरीके से वायरल हो रहा है. इस वीडियो में माही को शुद्ध और धाराप्रवाह कन्नड़ बोलते देख लोग दांतों तले उंगली दबा रहे हैं. वीडियो में पिता अभिषेक दुबे (अतुल) के साथ बातचीत करते हुए माही जिस आत्मविश्वास के साथ कन्नड़ बोलती है और फिर उसका हिंदी अर्थ समझाती है, वह भारत की विविधता में एकता का जीवंत उदाहरण पेश करता है. माही के माता-पिता अपनी बेटी की प्रतिभा पर गर्व करते हैं. पिता अभिषेक दुबे बहुराष्ट्रीय कंपनी एक्सेंचर में आईटी इंफ्रास्ट्रक्चर प्री-सेल्स के उपाध्यक्ष हैं, जबकि माता अमिता शुक्ला जेनपैक्ट में सूचना सुरक्षा विभाग की वरिष्ठ प्रबंधक हैं. रामायण के श्लोक और स्तुति के साथ भोजपुरी भी धाराप्रवाह बोलती है मृगांका का जन्म 2015 में बेंगलुरु में हुआ और उसकी पूरी शिक्षा वहीं हुई है. कक्षा 5 की यह छात्रा बिना किसी अतिरिक्त ट्यूशन के स्कूल में कन्नड़ विषय में हमेशा टॉपर रही है. उसे कन्नड़ पढ़ने, लिखने और बोलने में पूर्ण महारत हासिल है. कन्नड़ के साथ माही का अपने परंपरागत भाषा पर भी उतना ही पकड़ है. वह रामायण के श्लोक और स्तुति के साथ भोजपुरी उतनी ही धाराप्रवाह बोलती है. छठ के मौके पर वह हर वर्ष अपने घर आती है और परिवार व समाज से जुड़ाव बनाये रखती है.माही की इस मेधा के पीछे उसके परिवार का भी बड़ा योगदान है. उसके दादा दिवाकर दुबे मेदिनीनगर के वरिष्ठ अधिवक्ता हैं और दादी निर्मला द्विवेदी राजकीय मध्य विद्यालय की सेवानिवृत्त प्रधानाध्यापिका हैं. वहीं नाना नर्वदेश्वर शुक्ला क्षेत्रीय ग्रामीण बैंक गढ़वा (टडवा) से सेवा निवृत्त प्रबंधक हैं. आज के दौर में जहां भाषा को लेकर देश के कई प्रांतों में आये दिन टकराव की स्थिति बनती है, वहां माही की यह कहानी एक ठंडी फुहार की तरह है. यह वीडियो लोगों को यह संदेश दे रहा है कि भाषा जोड़ने का माध्यम होनी चाहिए, न कि तोड़ने का. गढ़वा की इस बेटी ने दिखा दिया है कि यदि सीखने का जज्बा हो, तो हम किसी भी प्रांत की भाषा और संस्कृति को अपनाकर वहां के लोगों का दिल जीत सकते हैं.

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