Energy Transition : जलवायु परिवर्तन की बड़ी वजह बन रहे हैं घटते जंगल, कोयले का खनन बना बड़ी वजह
Published by : Rajneesh Anand Updated At : 20 Sep 2022 9:49 PM
2019 में फॉरेस्ट सर्वे ऑफ इंडिया की रिपोर्ट में यह बताया गया कि झारखंड में 110 वर्ग किलोमीटर वन क्षेत्र बढ़ गया है. लेकिन सच्चाई यह है कि वन क्षेत्र तो बढ़ा है, लेकिन राज्य में घने जंगल घट गये हैं.
झारखंड में सौर ऊर्जा नीति जुलाई महीने में दोबारा लाॅन्च की गयी, इससे पहले वर्ष 2015 में सरकार ने सौर ऊर्जा नीति की घोषणा की थी. हालांकि अब तक प्रदेश में सौर ऊर्जा नीति पर गंभीरता से काम नहीं हो पाया है, जिसकी वजह से एनर्जी ट्रांजिशन अभी तक दूर की कौड़ी बना हुआ है. लेकिन 19 सितंबर को मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने एक बार फिर वैकल्पिक ऊर्जा को लेकर अपनी प्रतिबद्धता दोहराई और कहा कि हर जिले में 20 मेगावाट का सोलर पावर प्लांट लगाने के लिए 60 से 100 एकड़ जमीन चिह्नित की जाये. साथ ही सभी जिलों के हर गांव में कम से कम पांच योजनाएं लागू करने का निर्देश भी दिया है. इसे सौर ऊर्जा नीति के कार्यान्वयन की ओर एक कदम माना जा सकता है.
झारखंड में ऊर्जा का प्रमुख स्रोत कोयला है. 90 प्रतिशत तक बिजली का उत्पादन ताप विद्युत परियोजनाओं के जरिये ही होता है. ऐसे में यह जगजाहिर है कोयले का खनन भी प्रदेश में व्यापक स्तर पर होता है. कोयला उत्पादन के मामले में झारखंड देश में चौथे स्थान पर है. पहले स्थान पर छत्तीसगढ़, दूसरे पर ओडिशा, तीसरे पर मध्यप्रदेश और चौथे पर झारखंड है. बावजूद इसके झारखंड की महत्ता कोयला उत्पादन को लेकर देश में सबसे ज्यादा है. वजह यह है कि देश में कोकिंग कोल का 99.11 प्रतिशत उत्पादन झारखंड में होता है. 2020-21 में कोकिंग कोल का 44.787 एमटी उत्पादन हुआ जिसमें 44.387 एमटी उत्पादन झारखंड में हुआ. कोकिंग कोल का इस्तेमाल स्टील के उत्पादन में होता है इसलिए इसका महत्व बहुत अधिक है.
आम आदमी की जरूरतों को पूरा करने के लिए कोयले का उत्पादन बढ़ाया जा रहा है, लेकिन इसका दुष्प्रभाव प्रकृति पर साफ नजर आ रहा है. कोयला खनन की वजह से एक ओर जहां प्रदूषण का खतरा ही जा रहा है, वहीं जंगल -पहाड़ों के कटने और कम होने से जलवायु परिवर्तन का खतरा ना सिर्फ बढ़ रहा है, बल्कि साफ तौर पर मानव समाज इससे रूबरू है. बेमौसम बरसात से एक ओर कहीं सुखाड़ की स्थिति रहती है, तो दूसरी ओर बाढ़ की स्थिति बनी रहती है.
2019 में फॉरेस्ट सर्वे ऑफ इंडिया की रिपोर्ट में यह बताया गया कि झारखंड में 110 वर्ग किलोमीटर वन क्षेत्र बढ़ गया है. लेकिन सच्चाई यह है कि वन क्षेत्र तो बढ़ा है, लेकिन राज्य में घने जंगल घट गये हैं. 2019 के सर्वे में झारखंड में घना वन क्षेत्र 2603.2 वर्ग किमी था. यह 2021 के सर्वे में 2601.05 वर्ग किमी हो गया है. करीब दो वर्ग किमी की कमी आयी है. पूरे राज्य में सबसे अधिक वन क्षेत्र गढ़वा में बढ़ा है. वहीं पाकुड़, लोहरदगा, लातेहार और कोडरमा में वन क्षेत्र घटा है. 2021 के सर्वे के अनुसार झारखंड के क्षेत्रफल के 29.76% में जंगल है. 2019 में यह 29.62% था.
पर्यावरणविद् और जियोलाॅजी के प्रोफेसर डाॅ नीतीश प्रियदर्शी का कहना है कि कोयले का खनन बढ़ने से जंगलों पर असर पड़ता है, क्योंकि उनकी कटाई करके ही खनन होता है. साथ ही पहाड़ों को भी काटा जाता है. खनन क्षेत्रों में धूल की मात्रा अत्यधिक होती है, जिससे वायु प्रदूषण फैलता है और फेफड़े की गंभीर बीमारियां होती हैं. साथ ही यह भूमि को बंजर कर सकता है एवं हवा- पानी को प्रदूषित कर सकता है. प्रदूषण का असर जंगलों पर भी साफ नजर आता है. यह स्थिति मानव जीवन और पर्यावरण के लिए गंभीर खतरा है.
हाल ही में एक रिपोर्ट आयी थी, जिसने स्पष्ट तौर पर यह माना था कि महिलाओं के लिए वायु प्रदूषण बहुत बड़ा खतरा है. वायु प्रदूषण की वजह से महिलाओं में बांझपन तक का खतरा बढ़ा है. कोयला आधारित बिजली संयंत्रों ने झारखंड की कितनी कृषि योग्य भूमि को नुकसान पहुंचाया इसका आकलन मुश्किल जरूर है, लेकिन यह एक सच्चाई है, इससे इनकार नहीं किया जा सकता है.
ऊर्जा ट्रांजिशन इस सदी की डिमांड बन चुका है. पृथ्वी को जलवायु परिवर्तन से बचाने के लिए शून्य-कार्बन उत्सर्जन की ओर लेकर जाना होगा. पीएम मोदी ने यह वादा भी किया है कि 2070 तक देश में शून्य उत्सर्जन होगा. इस स्थिति तक पहुंचने के लिए झारखंड सरकार को सौर ऊर्जा नीति के सौ सोलर विलेज की ओर जल्दी बढ़ना होगा. सीएम हेमंत सोरेन ने जो पहल की है, उम्मीद की जानी चाहिए कि में वह क्रांतिकारी पहल होगा.
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लेखक के बारे में
By Rajneesh Anand
राजनीति,सामाजिक, इतिहास, खेल और महिला संबंधी विषयों पर गहन लेखन किया है. तथ्यपरक रिपोर्टिंग और विश्लेषणात्मक लेखन में रुचि. इलाहाबाद विश्वविद्यालय से स्नातक. IM4Change, झारखंड सरकार तथा सेव द चिल्ड्रन के फेलो के रूप में कार्य किया है. पत्रकारिता के प्रति जुनून है. प्रिंट एवं डिजिटल मीडिया में 20 वर्षों से अधिक का अनुभव.
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