East Singhbhum News : शिल्पकारों के उत्पाद को मिलेगी पहचान, बाजार उपलब्ध करायेंगे

Author Akash
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East Singhbhum News : शिल्पकारों के उत्पाद को मिलेगी पहचान, बाजार उपलब्ध करायेंगे

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उपायुक्त कर्ण सत्यार्थी सोमवार को बोड़ाम के सुदूर देहात अंधारझोर गांव पहुंचे. यहां उन्होंने 70 शिल्पकारों से मुलाकात की.

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पटमदा.

उपायुक्त कर्ण सत्यार्थी सोमवार को बोड़ाम के सुदूर देहात अंधारझोर गांव पहुंचे. यहां उन्होंने 70 शिल्पकारों से मुलाकात की. मौके पर उनके साथ बीडीओ कीकू महतो, सीओ रंजीत रंजन समेत अन्य अधिकारी मौजूद थे. इस दौरान उपायुक्त ने ग्रामीणों से मुलाकात कर उनकी कला को जाना. उनकी समस्याओं को सुना तथा सरकार की योजनाओं की भी जानकारी देते हुए लाभ लेने के लिए कलाकारों को प्रेरित किया. उपायुक्त ने शिल्पकारों से तबला, मांदर, ढोल, मृदंग आदि बनाने में लगने वाले समय, लागत, निर्माण सामग्री, उपलब्ध बाजार एवं उनके उत्पाद की मांग तथा उत्पाद को मिलने वाली कीमत की जानकारी ली. उपायुक्त ने शिल्पकारों के उत्पाद को पहचान दिलाने, बाजार उपलब्ध कराने का भरोसा दिया. साथ ही स्थानीय शिल्पकारों के उत्पाद की ब्रांडिंग, लोगो, ट्रेड मार्क कराने कराने का आश्वासन दिया. मौके पर उपस्थित संबंधित उद्योग विभाग के प्रतिनिधियों को जरूरी दिशा-निर्देश भी दिए. इस दौरान उन्होंने बोड़ाम-अंधारझोर मुख्य सड़क के आसपास सरकारी जमीन चिह्नित कर कम्यूनिटी फैसिलिटी सेंटर निर्माण के लिए जल्द से जल्द प्रस्ताव भेजे जाने का निर्देश बीडीओ व सीओ को दिया. उन्होंने कहा कि कम्यूनिटी फैसिलिटी सेंटर बन जाने से ग्राहकों को शिल्पकारों तक पहुंचाने में सुविधा होगी. वहीं स्थानीय शिल्पकार भी इससे लाभान्वित होंगे.

साकची में स्थल का किया निरीक्षण

अंधारझोर से लौटने के पश्चात उपायुक्त सीधे साकची बाजार पहुंचे, उन्होंने संजय मार्केट के पास बने विश्वकर्मा प्वाइंट का जायजा लिया. मौके पर उन्होने शिल्पकारों के लिए निर्मित शेड को पक्का निर्माण कराने के निर्देश मौजूद पदाधिकारियों को दिया. उन्होंने प्रधानमंत्री विश्वकर्मा योजना का लाभ अंधारझोर के शिल्पकारों को उपलब्ध कराने का निर्देश जिला उद्यमी समन्वयक को दिया. वहीं गांव की महिलाओं को जेएसएलपीएस एवं आरसेटी प्रशिक्षण अंतर्गत प्रशिक्षण देते हुए स्वरोजगार से जोड़ने का निर्देश दिया… अंधारझोर गांव के शिल्पकारों ग्रामीणों ने बताया कि लागत के अनुपात में मूल्य नहीं मिलना तथा बाजार की समस्या होने के कारण गांव के युवा इस कला को आगे बढ़ाने में उतनी दिलचस्पी नहीं रख रहे हैं. कम आमदनी को देखते हुए दूसरा पेशा भी अपनाने लगे हैं.

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