पूर्वी सिंहभूम: गुड़ाबांदा की ''रत्नगर्भा'' धरती पर खनन माफियाओं की गिद्ध दृष्टि

गुड़ाबांदा की रत्नगर्भा धरती पर खनन माफियाओं की नजर है। अवैध पन्ना खनन के कारण अब तक कई ग्रामीणों की जान जा चुकी है, प्रशासन की चुप्पी पर उठ रहे सवाल।
गुड़ाबांदा: पूर्वी सिंहभूम जिले के घाटशिला अनुमंडल मुख्यालय से करीब 70 किलोमीटर दूर ओडिशा सीमा से सटे गुड़ाबांदा प्रखंड की धरती सही मायनों में रत्नगर्भा है. यहां के बीहड़ जंगलों और दुर्गम पहाड़ों के भूगर्भ में अरबों रुपये का खजाना छिपा हुआ है. भूतत्व विभाग के सर्वे, वैज्ञानिक जांच और गहन निरीक्षण में स्पष्ट हो चुका है कि गुड़ाबांदा के पहाड़ों में करीब 6,700 किलोग्राम बहुमूल्य पन्ना और नीलम पत्थर का विशाल भंडार मौजूद है. भूतत्व विभाग के दावों के मुताबिक, यहां मिलने वाला पन्ना वैश्विक स्तर पर बेहद उच्च गुणवत्ता का है. रत्न बाजार के कारोबारियों की मानें तो अंतर्राष्ट्रीय बाजार में यहां के पन्ना की कीमत एक रत्ती (182.25 मिलीग्राम) की करीब 5,000 रुपये आंकी गयी है. इस गणित के हिसाब से एक किलोग्राम पन्ना का मूल्य 2,74,34,842 (दो करोड़ चौहत्तर लाख चौतीस हजार आठ सौ बयालीस) रुपये बैठता है. इस लिहाज से पूरे गुड़ाबांदा प्रखंड में अरबों-खरबों रुपये की खनिज संपदा भूगर्भ में दफन है, जिस पर अब अंतरराज्यीय खनन माफियाओं का कब्जा होता जा रहा है.
2012 से पहले चोरी-छिपे चलता था अवैध खनन
गुड़ाबांदा के जंगलों में पन्ना का अवैध खनन साल 2012 से पहले से ही चोरी-छिपे किया जा रहा था. उस वक्त स्थानीय सीधे-साधे आदिवासियों और ग्रामीणों को इस पत्थर की असली कीमत का कोई अंदाजा नहीं था. वे इसे मामूली चमकीला पत्थर समझकर बाहरी तस्करों को मामूली मजदूरी दर पर सौंप देते थे.
सुरंग धंसने से तीन लोगों की मौत से खुला रहस्य
इस अरबों रुपये के काले खेल का भंडाफोड़ तब हुआ, जब वर्ष 2012 में बेनीडांगर इलाके में अवैध रूप से खोदी गयी एक गहरी सुरंग अचानक धंस गयी. इस हादसे में तीन स्थानीय मजदूर झापोल मुर्मू, रवि मुर्मू (दोनों सगे भाई) और बद्रीनाथ मुर्मू की मलबे में दबकर मौत हो गयी. इस हादसे ने पूरे प्रशासन को हिलाकर रख दिया और पहली बार आधिकारिक रूप से पता चला कि गुड़ाबांदा में पन्ना का इतना बड़ा भंडार है. प्रशासन ने तब आनन-फानन में खदानों को सील कर दिया था.
मौत की सुरंगों में अब भी जारी है खूनी खेल
हादसे और पुलिसिया कार्रवाई के बाद कुछ दिनों तक तो खनन बंद रहता है, लेकिन जैसे ही मामला शांत होता है, खनन माफिया स्थानीय एजेंटों के जरिए दोबारा सक्रिय हो जाते हैं. साल 2012 के हादसे के बाद भी मौत की इन सुरंगों में खेल चलता रहा. परिणामस्वरुप, 31 दिसंबर 2023 को एक बार फिर अवैध खनन के दौरान मिट्टी धंसने से झाबू मुर्मू (21 वर्ष) नामक एक और आदिवासी युवक की जान चली गयी. इसके बावजूद माफियाओं के हौसले पस्त नहीं हुए और चंद रुपयों की मजदूरी के लालच में आज भी ग्रामीण अपनी जान हथेली पर रखकर इन असुरक्षित खदानों में उतर रहे हैं.
अंतरराज्यीय तस्करों का नेटवर्क
स्थानीय लोग गरीब, बाहरी बने धनकुबेर जांच में यह बात पूरी तरह साफ हो चुकी है कि गुड़ाबांदा के पन्ना पर पश्चिम बंगाल, राजस्थान के जयपुर, ओडिशा और उत्तर प्रदेश के बड़े पत्थर कारोबारियों और तस्करों की पैनी नजर है. 2012 से पहले जयपुर और यूपी के सिंडिकेट यहां सक्रिय थे, जो स्थानीय भोले-भाले लोगों को दिहाड़ी देकर यहां से अरबों का पन्ना समेटकर ले गये. नतीजा यह हुआ कि बाहरी लोग यहां के पन्ना से धनकुबेर बन गये, जबकि बहुमूल्य रत्न की छाती पर रहने वाले स्थानीय ग्रामीण आज भी दाने-दाने को मोहताज हैं और घोर गरीबी में जीने को विवश हैं.
अबतक तीन किलो पन्ना जब्त, सात भेजे गये जेल
हाल ही में गुड़ाबांदा से पन्ना की तस्करी का एक और बड़ा मामला सामने आया, जब बहरागोड़ा इलाके में पुलिस ने तीन तस्करों को रंगे हाथों दबोचा. इनके पास से 1 किलोग्राम से अधिक उच्च श्रेणी का पन्ना जब्त किया गया, जिसे कोलकाता के रास्ते बाहर भेजने की तैयारी थी. जब्त पन्ना की कीमत करोड़ों में है. अब तक की कुल पुलिसिया कार्रवाई में पुलिस लगभग 3 किलोग्राम पन्ना जब्त कर चुकी है. पन्ना तस्करी और अवैध खनन के मामले में अब तक 7 मुख्य आरोपियों को नामजद कर जेल भेजा जा चुका है, जिनमें से कुछ अभी भी सलाखों के पीछे हैं.
क्या कहते हैं अधिकारी
खदानों को पूरी तरह सील रखा गया है. अंतिम बार 16 अक्टूबर 2025 को इन खदानों की सुरक्षा बढ़ाते हुए इन्हें कड़ाई से सील किया गया था. पुलिस लगातार क्षेत्र में नजर रख रही है और वर्तमान में खनन पूरी तरह से बंद है.
सुमित कुमार, थाना प्रभारी, गुड़ाबांदा
तीन पहाड़ों में है भंडार
भूतत्व विभाग की रिपोर्ट के अनुसार, गुड़ाबांदा के मुख्य रूप से तीन पहाड़ों बारूनमुठी, ठुरकूगोड़ा और बाउटिया में पन्ना का मुख्य खदान क्षेत्र है. सर्वे के मुताबिक, इन पहाड़ों में जमीन से केवल 20 मीटर की गहराई तक ही पन्ना का अथाह भंडार उपलब्ध है, जिसके लिए बहुत भारी मशीनरी की भी आवश्यकता नहीं है. विभाग इसकी विस्तृत रिपोर्ट केंद्र और राज्य सरकार को बहुत पहले ही भेज चुका है. लेकिन विडंबना यह है कि सरकार द्वारा अब तक इस अनमोल खनिज की वैध नीलामी या सरकारी स्तर पर खनन शुरू करने को लेकर कोई सार्थक नियमावली या नीति नहीं बनाई जा सकी है. सरकारी उदासीनता का ही नतीजा है कि एक तरफ जहां चालाक तस्कर और माफिया इस रत्न को लूटकर मालामाल हो रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ सरकार को करोड़ों रुपये के राजस्व का नुकसान उठाना पड़ रहा है. अब क्षेत्र की जनता और बुद्धिजीवियों की निगाहें सरकार पर टिकी हैं कि कब यहां वैध खनन शुरू होगा ताकि क्षेत्र के सैकड़ों बेरोजगारों को रोजगार की नयी रोशनी मिल सके.
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