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east singhbhum news: फोरलेन पार कर चार किमी दूर धोड़ांगा स्कूल जाने को विवश हैं बच्चे

Updated at : 03 Jul 2025 2:11 AM (IST)
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east singhbhum news: फोरलेन पार कर चार किमी दूर धोड़ांगा स्कूल जाने को विवश हैं बच्चे

विलय के नाम पर उलदा प्रावि बंद होने से बच्चे व अभिभावक परेशान, ग्रामीणों ने उठायी उलदा स्कूल फिर से खोलने की मांग

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गालूडीह. घाटशिला प्रखंड के उलदा प्राथमिक विद्यालय को विलय के नाम 2016 में बंद कर दिया गया. तब से माहलीपाड़ा के छोटे बच्चे (1 से 5) फोरलेन पार कर चार किमी दूर धोड़ांगा स्कूल जाते हैं. पहले तो यह टू लेन था तो किसी तरह बच्चे पार कर जाते थे. पर, फोरलेन बनने से जान जोखिम में डाल बच्चे पार करते हैं. स्कूल जाने के समय अभिभावक बच्चों को फोरलेन पार करा देते हैं. लेकिन छुट्टी के समय घर लौटने के दौरान अभिभावक के नहीं रहने से बच्चों को खतरा रहता है. इसकी चिंता ग्रामीणों को सताती है. ग्रामीण कहते हैं इसी गांव के करीब 20 से अधिक बच्चे थे, जो उलदा प्रावि में पढ़ते थे. फिर क्यों स्कूल बंद किया गया, यह समझ से परे है. गांव में आगनबाड़ी भी नहीं है. आंगनबाड़ी के लिए भी गर्भवती, धात्री माता और छोटे बच्चो को फोरलेन पार कर उलदा आंगनबाड़ी जाना पड़ता है. इससे भय बना रहता है. इस भय से अधिकतर छोटे बच्चे और माताएं आंगनबाड़ी नहीं जाती हैं. इससे सरकारी लाभ से बच्चे और माताएं वंचित हैं. ग्राम प्रधान घासीराम माहली ने कहा कि विलय में बंद उलदा प्रावि को खोला जाना चाहिए. उलदा और माहलीपाड़ा के काफी बच्चे हैं जो इसी स्कूल में पढ़ना चाहते हैं. धोडांगा यहां से दूर है और सबसे बड़ी समस्या फोरलेन की है, जिसे पार कर बच्चों को धोडांगा स्कूल जाना पड़ता है. बीच में जंगल वाला रास्ता भी पड़ता है.

वर्षों से बसे हैं 35 परिवार, पर जमीन का कागज नहीं होने से किसी को नहीं मिला सरकारी आवास:

माहलीपाड़ा में करीब 35 परिवार वर्षो से यहां बसे हैं. पर किसी के पास जमीन के कागजात नहीं होने से सभी आदिवासी समाज के होते हुए भी सरकारी आवास के लाभ से वंचित हैं. सभी कच्चे मकान में रहने को बाध्य है. ग्राम प्रधान ने बताया कि सभी गरीब और मजदूर वर्ग हैं. कई परिवार बांस से सामग्री बनाकर बेचते हैं तो अधिकतर लोग मजदूरी करते हैं. पर जमीन का कागज नहीं होने से अबुआ, पीएम आवास से वंचित हैं.

राशन मिलता है, पर शौचालय नहीं मिला, जलमीनार है पर पानी नहीं :

ग्रामीणों ने बताया कि सभी का राशन कार्ड बना है. राशन मिलता है. पीएच कार्ड सभी के पास है. प्रति सदस्य पांच किलो के हिसाब से राशन मिलता है. पर किसी को सरकारी शौचालय का लाभ नहीं मिला. सरकार स्वच्छता अभियान चला रही. पर इस गांव में एक भी सरकारी शौचालय नहीं बना. आज भी यहां के लोग जंगलों में शौच के लिए जाते हैं. यहां जल मीनार तो है. पर सभी खराब पड़े हैं. जल मीनार से पानी नहीं मिलता. पूरे गांव में एक चापानल है. जिससे प्यास बुझा रहे हैं.

क्या कहते हैं माहलीपाड़ा के ग्रामीण

साल 2016 में झारखंड के 4096 स्कूलों को दूसरे स्कूलों में विलय कर दिया गया था. विलय के बाद गांव का स्कूल बंद है, बच्चे चार किमी दूर धोडांगा गांव के स्कूल में पढ़ने जाते हैं. बीच में फोरलेन है. बच्चे फोरलेन पार कर स्कूल जाते हैं. इस कारण डर बना रहता है.

बाहा माहली, ग्रामीण

————————————–अपने नाम से जमीन नहीं रहने के कारण अबुआ आवास का लाभ नहीं मिल रहा है. कई लोगों का घर जर्जर हालात में है लेकिन बस्ती के ग्रामीण जर्जर घरों में जान जोखिम में डालकर रह रहे हैं. सरकार को इस ओर ध्यान देना चाहिए.

सरस्वती माहली, ग्रामीण————————————

खतियान नहीं रहने के कारण बस्ती में रह रहे माहली जाति के बच्चों का जाति प्रमाण पत्र नहीं बन रहा है. जाति प्रमाण पत्र नहीं बनने के कारण विद्यार्थियों के लोगों को आरक्षण का लाभ नहीं मिल रहा है. शिक्षा ग्रहण कर रहे छात्र-छात्राओं को राज्य सरकार द्वारा दी जानेवाली स्कॉलरशिप से भी वंचित रहना पड़ रहा है.

मानको माहली, ग्रामीण

————————————–बस्ती के लोगों की जान खतरे में है. क्योंकि घरों की छतों के उपर से 11 हजार वोल्ट का बिजली तार गुजरा है. तारों से चिंगारी निकलता रहता है. तार को नहीं हटाया गया तो कभी भी हादसा हो सकता है. 11 हजार वोल्ट तार के कारण ग्रामीणों में भय बना रहता है.

मोहन माहली, ग्रामीण—————————————

बस्ती के बच्चे आंगनबाड़ी केंद्र के विभिन्न लाभों से वंचित हैं. क्योंकि बच्चों को फोरलेन हाइवे पार कर आंगनबाड़ी जाना पड़ता है. प्रतिदिन फोरलेन पार कर बच्चों को आंगनवाड़ी ले जाना संभव नहीं है. इस वजह से बच्चे केंद्र की सारी सुविधाओं से वंचित हैं.

मंगला माहली, ग्रामीण

——————————————–बस्ती में कई दशक पहले बने इंदिरा आवास जर्जर हो गये हैं. इन घरों में माहली परिवार जान जोखिम में डाल कर रहने को विवश हैं. खतियान नहीं रहने के कारण बस्ती के ग्रामीणों को नया आवास नहीं रहा है. बरसात में जीना मुश्किल हो जाता है.

नारायण माहली

डिस्क्लेमर: यह प्रभात खबर समाचार पत्र की ऑटोमेटेड न्यूज फीड है. इसे प्रभात खबर डॉट कॉम की टीम ने संपादित नहीं किया है

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