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Lead News: शैक्षणिक संस्थानों में देवनागरी से हो संताली की पढ़ाईपेज-2-संताल स्टूडेंट्स और यूनिवर्सिटी टीचर्स एसोसिएशन ने की सरकार से मांग संताली क़े लिए देवनागरी लिपि को दी जाय मान्यता

संताल परगना स्टूडेंट्स यूनियन और ऑल इंडिया यूनिवर्सिटी संताल टीचर्स एसोसिएशन के प्रतिनिधिमंडल ने मंत्री दीपिका पाण्डेय सिंह से दुमका परिसदन में मुलाकात कर मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन के नाम ज्ञापन सौंपा.

मांग. छात्र व शिक्षक संघ ने सीएम के नाम मंत्री दीपिका पाण्डेय सिंह को सौंपा ज्ञापन, कहा कहा : बंगाल व ओड़िशा के लोग संताली को संवाददाता, दुमका संताल परगना स्टूडेंट्स यूनियन और ऑल इंडिया यूनिवर्सिटी संताल टीचर्स एसोसिएशन के प्रतिनिधिमंडल ने मंत्री दीपिका पाण्डेय सिंह से दुमका परिसदन में मुलाकात कर मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन के नाम ज्ञापन सौंपा. संताली के लिए देवनागरी लिपि को मान्यता प्रदान करने का अनुरोध किया है. प्रतिनिधिमंडल ने कहा है कि संताली को न्यायिक विभाग की अधिसूचना संख्या 2174 दिनांक 18 मई 1944 के तहत संताल परगना के लिए न्यायालय की वैकल्पिक भाषा के रूप में अधिसूचित किया गया था. शिक्षा विभाग ने संताली और अन्य क्षेत्रीय भाषा के लिए देवनागरी लिपि को मान्यता दिया था. लेकिन ओड़िशा व पश्चिम बंगाल के कुछ लोगों द्वारा राजनीतिक रूप से प्रेरित होकर संताल परगना में संताली के लिए ओलचिकी लिपि की मांग उठायी जा रही है, जो तर्कसंगत नहीं है. कहा कि ओड़िशा में मुण्डारी भाषा समूह के लिए बनी ओलचिकी अवैज्ञानिक एवं दोषपूर्ण लिपि है, इससे संताल परगना की विशुद्ध एवं मानक संताली भाषा विकृत व प्रदूषित होने का खतरा है. ओड़िशा व ओलचिकि लिपि के समर्थक झारखंड की एकता एवं अखंडता को तोड़ना चाहते हैं. यहां के सौहार्दपूर्ण वातावरण को भंगकर संताल परगना में अशांति फैलाना चाहते है, जिसे कतई बर्दाश्त नहीं किया जा सकता है. कहा कि देश में संताल परगना की संताली को मानक संताली भाषा माना गया है, क्योंकि यहां पूरे भारत में सबसे शुद्ध एवं भारी बहुमत में संताली बोली जाती है. इसीलिए यहां की संताली को मानक मानते हुए देवनागरी लिपि में ही सभी शिक्षण संस्थानों में पठन-पाठन यथावत चलने दिया जाये. इसलिए भी कि देवनागरी लिपि पूर्ण रूप से शुद्ध, सरल एवं वैज्ञानिक लिपि है. इसका वैज्ञानिक अध्ययन हुआ है. डॉ डोमन साहू ”समीर”, बाबूलाल मुर्मू आदिवासी, नारायण सोरेन ”तोडे़ सुताम, भैया हांसदा चासा, डॉ कृष्णचंद्र टुडू, अलाकजाड़ी मुर्मू जैसे बहुत सारे भाषाविद, साहित्यकार एवं भाषा वैज्ञानिक देवनागरी लिपि को ही वैज्ञानिक लिपि के रूप में प्रमाण दिया है. कहा कि ओलचिकि अवैज्ञानिक व दोषपूर्ण लिपि है. इसलिए इसे संताल परगना समेत पूरे झारखंड में किसी तरह की कोई तवज्जो न दी जाये. मौके पर डॉ शर्मिला सोरेन, डॉ मेरी मार्गरेट, डॉ सुशील मरांडी, सिधोर हांसदा, कांग्रेस के प्रदेश प्रवक्ता श्यामल किशोर सिंह, जिला महासचिव संजीत सिंह एवं जिला परिषद के पूर्व उपाध्यक्ष असीम मंडल मौजूद थे.

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Prabhat Khabar News Desk
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