जनजातीय समाज का विकास बेहद जरूरी

Updated at : 01 May 2017 2:03 AM (IST)
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जनजातीय समाज का विकास बेहद जरूरी

द संताल टॉक. जनजातीय समाज के उत्थान पर बुद्धिजीवियों ने किया विचार-विमर्श, कहा दुमका : अपनी सभ्यता-संस्कृति को अक्षुण्ण रखते हुए जनजातीय समाज के विकास लिए लिए हम सब को मिलकर कार्य करना होगा. साहित्य-संस्कृति से हमारी पहचान है, पर इसे बचाये रखते हुए हमें आगे बढ़ने की चुनौती है. उक्त बातें उपराजधानी दुमका के […]

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द संताल टॉक. जनजातीय समाज के उत्थान पर बुद्धिजीवियों ने किया विचार-विमर्श, कहा

दुमका : अपनी सभ्यता-संस्कृति को अक्षुण्ण रखते हुए जनजातीय समाज के विकास लिए लिए हम सब को मिलकर कार्य करना होगा. साहित्य-संस्कृति से हमारी पहचान है, पर इसे बचाये रखते हुए हमें आगे बढ़ने की चुनौती है. उक्त बातें उपराजधानी दुमका के सारो-लुखी गाड़ में ग्रामीणों, बुद्धिजीवी और समाज सेवक के लोगों के बीच द संताल टॉक (The Santal Talk) विचार गोष्ठी में सिदो कान्हू मुर्मू
विश्वविद्यालय के प्रभारी कुलपति डॉ सत्यनारायण मुंडा ने कही.
उन्होंने आदिवासी समाज के विकास, शिक्षा, सभ्यता और संस्कृति आदि मुद्दों को लेकर विस्तार से अपनी बातों को रखा. डॉ धुनी सोरेन ने कहा कि दुमका में संताल कल्चरल एंड हेरिटेज सेंटर बनना चाहिए. जिससे समाज को बहुत सारे लाभ होंगे. इस केंद्र में एक मिनी ऑडिटोरियम, प्रदर्शनी केंद्र, संग्रहालय आदि हो. विश्वविद्यालय की वनस्पति विज्ञान विभाग की शिक्षिका डॉ प्रभावती बोदरा ने कहा विज्ञान भाषा को आदिवासी भाषा में समझाया जाय तो यह आदिवासी छात्रों को समझने में काफी आसानी होगी.
डॉ ने आगे कहा आज पूरा विश्व पर्यावरण को लेकर चिंतित है लेकिन आदिवासी समाज आदि काल से ही इसे बचाये रखने का कोशिश करते आया है. विजय टुडू ने कहा कि हम सभी अगर महीने के एक दिन अपने समाज को समय दें, तो काफी बदलाव ला सकते हैं. डॉ प्रमोदिनी हांसदा ने कहा आदिवासी समाज के मौखिक साहित्य को लिपिबद्ध किये जाने की जरूरत है. संताल रिसर्च फाउंडेशन कोलकाता को रोत्रे मुर्मू ने कहा कि आदिवासी समाज का नाच-गान पद्धति भी विज्ञान पर आधारित है.
संताल अकादमी के निदेशक व विवि के विकास पदाधिकारी सुजीत कुमार सोरेन ने इन सारे बिंदुओं पर संताल अकादमी की भावी योजनाओं के बारे में बताया. वहीं प्रो ईश्वर मरांडी ने कहा कि संताली भाषा एक खजाना है लेकिन वर्तमान समय में सहेज कर इसे रखना चुनौतीपूर्ण कार्य है. इसके संरक्षण की जरूरत है. भारतीय राजस्व सेवा के सेवानिवृत्त अधिकारी यूएन मांझी ने भी संताल कला और संस्कृति के बारे में प्रोत्साहन पर बल दिया.
युवा सामाजिक कार्यकर्ता सच्चिदानंद सोरेन ने कहा हम सभी पढ़े-लिखे आदिवासियो को समाज के प्रति उत्तरदायी बनने की जरूरत है.आज आदिवासी समाज पीछे है उसका एक बहुत बड़ा कारण हम पढ़े लिखे आदिवासी का सामाजिक उत्तरदायी नही निभाना है. जरूरत है हम पढ़े-लिखे आदिवासी अपने समाज में नीचे पायदान के लोगों के लिए कार्य करें. जबकि रुकमनी हेम्ब्रम ने कहा आदिवासी समाज आज अशिक्षा और दारू रूपी दानव के कारण विकास से दूर है.
अतः युवा आदिवासी समाज को इसे दूर करने की कोशिश करनी चाहिए. परिचर्चा में डॉ अंजुला मुर्मू, भगवती हेम्ब्रम, कल्याणी हेम्ब्रम, सीएम मुर्मू, महेंद्र नाथ मांझी, शारदा प्रसाद किस्कू, बैद्यनाथ हेम्ब्रम, सनातन मुर्मू, ईश्वर सोरेन, रंजीत बास्की, भीम हेम्ब्रम, प्रिंस हेम्ब्रम, मून सोरेन, विश्वपति हेम्ब्रम, जुली हेम्ब्रोम, अभिनव बादल सोरेन आदि उपस्थित थे.
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