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केंद्र का नाम बदला, दवाइयां आयीं फिर भी जेनरिक दवा नहीं लिख रहे चिकित्सक

धनबाद . मरीजों को सस्ती दवा उपलब्ध कराने को लेकर केंद्र सरकार की कोशिश कोयलांचल में फिलहाल धरातल पर नहीं उतर रही है. सरकारी घोषणा के आठ माह बाद भी चिकित्सकों का एक बड़ा तबका जेनरिक की जगह ब्रांडेड दवाएं ही लिख रहे हैं. ब्रांडेड दवाओं को लिखने में सरकारी से लेकर निजी अस्पतालों के […]

धनबाद . मरीजों को सस्ती दवा उपलब्ध कराने को लेकर केंद्र सरकार की कोशिश कोयलांचल में फिलहाल धरातल पर नहीं उतर रही है. सरकारी घोषणा के आठ माह बाद भी चिकित्सकों का एक बड़ा तबका जेनरिक की जगह ब्रांडेड दवाएं ही लिख रहे हैं. ब्रांडेड दवाओं को लिखने में सरकारी से लेकर निजी अस्पतालों के चिकित्सकों का एक सा हाल है.

बता दें कि अप्रैल 2017 में जन अौषधि केंद्र का नाम बदल कर प्रधानमंत्री भारतीय जन औषधि केंद्र रखा गया. प्रधानमंत्री ने इसे लेकर काफी संवेदनशीलता दिखायी. इन केंद्रों में दवाइयां भेजी जाने लगीं. चिकित्सकों से जेनरिक दवा लिखने की अपील की गयी, लेकिन आठ माह गुजरने के बाद भी प्राय: चिकित्सक जेनरिक दवा नहीं लिख रहे हैं.

प्रखंडों में खोलने थे जेनरिक दवा केंद्र, नहीं मिल रहा लाइसेंस : सरकार के निर्देशानुसार आम लोगों तक सस्ती जेनरिक दवा पहुंचाने के लिए प्रखंडों में जेनरिक दवा केंद्र खोलने हैं.

लेकिन धनबाद में इन आठ माह में किसी भी प्रखंड में जेनरिक दवा केंद्र नहीं खोला जा सका है. कुछ माह पूर्व जेनरिक दवा के लाइसेंस के लिए लगभग 50 आवेदन ड्रग कार्यालय में आये थे, लेकिन किसी के साथ फार्मासिस्ट नहीं था. लिहाजा ड्रग कार्यालय ने इसे वापस कर दिया. अब प्रखंडों में जेनेरिक दवा केंद्र खुलने पर भी संकट हो गया है.

पीएमसीएच के जेनरिक केंद्र में 88 प्रकार की दवा : केंद्र सरकार की मॉनीटरिंग के बाद पीएमसीएच के जेनरिक केंद्र में लगभग 88 प्रकार की दवा उपलब्ध करायी गयी. फिलहाल यहां 75 विभिन्न प्रकार की दवाएं मौजूद हैं. कुछ चिकित्सक तो जेनरिक दवा लिख रहे हैं, लेकिन एक बड़े तबकों को ब्रांडेड दवाओं से मोहभंग नहीं हो रहा है. पीएमसीएच को छोड़कर शहर की दूसरी जगहों पर एक भी केंद्र अभी तक नहीं खुल पाया है. ऐसे में सस्ती दवा के लिए मरीजों को अभी लंबा इंतजार करना पड़ सकता है.
जानें जेनरिक व ब्रांडेड दवाओं को : जेनरिक दवाइयां ब्रांडेड दवाइयों की तुलना में औसतन पांच गुनी सस्ती होती हैं. जेनरिक दवाएं उत्पादक से सीधे रिटेलर तक पहुंचती हैं. इन दवाओं के प्रचार-प्रसार पर कंपनियों को कुछ खर्च नहीं करना पड़ता. एक ही कंपनी की ब्रांडेड और जेनेरिक दवाओं के मूल्य में काफी अंतर होता है. चूंकि जेनरिक दवाओं के मूल्य निर्धारण पर सरकारी अंकुश होता है, इसलिए वह सस्ती होती हैं. जबकि ब्रांडेड दवाओं की कीमत कंपनियां खुद तय करती हैं, इसलिए वह महंगी होती हैं. कमीशन के लिए ब्रांडेड दवाओं को ही डॉक्टर अधिकांश लिखते हैं. 10 रुपये की लागत की दवा बाजार में 80 रुपये तक बिकती है, इसमें चिकित्सकों को 40 से 50 प्रतिशत तक कमीशन जाता है.
ब्रांडेड दवा बाजार से हटे, जेनरिक आये : डॉ सुशील
आइएमए के सचिव डॉ सुशील कुमार ने कहा कि चिकित्सक भी जेनरिक दवा ही लिखना चाहते हैं, लेकिन यह हर जगह उपलब्ध नहीं है. ब्रांडेड दवा को सरकार को बाजार से हटा देना चाहिए. इसकी जगह पर जेनरिक दवा आये. नेता से लेकर अफसर भी आम लोगों की तरह यह दवा खायें, चिकित्सकों को जेनरिक दवा लिखने से गुरेज नहीं है.

Prabhat Khabar Digital Desk
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