मधुपुर. शहर के भेड़वा नावाडीह स्थित राहुल अध्ययन में विश्व मातृभाषा दिवस पर संगोष्ठी का आयोजन किया गया. मौके पर धनंजय प्रसाद ने कहा कि मातृभाषा के विकास के बिना राष्ट्रीय भाषा का विकास संभव नहीं है. भाषा सिर्फ सूचना प्रसारण का माध्यम भी नहीं होती बल्कि सभ्यता की आंख और संस्कृति की वाहक भी होती है. भूमंडलीकरण के इस दौर में अधिकांश मातृ भाषाएं विलुप्ति के कगार पर है. दुनिया भर में 8, 324 भाषाएं व बोली हैं, इनमें लगभग 7, 000 भाषाएं अभी भी इस्तेमाल में है. तेजी से बदलती दुनिया में कई भाषाएं लुप्त हो रही है. हमारे देश में 1635 मातृभाषाएं और 234 पहचान योग्य मातृभाषाएं है. 8 अनुसूची के तहत मान्यता प्राप्त 22 भाषाएं हैं. 21 फरवरी को विश्व मातृभाषा दिवस के रूप में मनाया जाता है, इसकी शुरुआत 2000 से हुई है. इसका मकसद है कि भाषाएं विविधता के महत्व को रेखांकित करना है. वैसे कहे तो मातृभाषा हमारे व्यक्तित्व में धुली मिली होती है और हमारे मानसिक विकास की भी साक्षी होती है. किन्तु मातृभाषाएं को जीवित रहने के लिए काफी जद्दोजहद करनी पड़ रही है. सरकार साहित्य अकादमी गठित कर भाषाविदों व क्षेत्रीय भाषाओं के साहित्यकारों को प्रोत्साहित करें. उनकी रचनाओं को प्रकाशित करायें तथा स्कूल, काॅलेजों में पढ़ाई की व्यवस्था करें तभी मातृभाषा का विकास संभव हो पायेगा. खोरठा झारखंड की सबसे अधिक बोली जाने वाली क्षेत्रीय भाषा है और इसके साहित्य भी काफी समृद्ध है पर सरकारी प्रोत्साहन के अभाव पिछड़ रही है. जरूरत है सरकार इस ओर भी ध्यान दें. तभी मातृभाषा का विकास संभव हो पायेगा. मौके पर अन्य लोगों ने विचार व्यक्त किया. ————– विश्व मातृभाषा दिवस पर संगोष्ठी आयोजित
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