शोषण ही नहीं, सामाजिक व्यवस्था पर प्रहार भी बना हूल का कारण
Published by : Prabhat Khabar News Desk Updated At : 30 Jun 2023 8:57 AM
ईस्ट इंडिया कंपनी एक व्यापारिक कंपनी थी, उसके आय का मुख्य स्रोत लगान था. दामिन-इ-कोह में खेती योग्य भूमि बढ़ने के बाद इस क्षेत्र से लगान की राशि बढ़ा दी गयी.
डॉ अजय सिन्हा
ईस्ट इंडिया कंपनी ने अपने जमींदारों की मदद से आदिवासियों को वर्तमान संताल परगना में नियोजित तरीक़े से बसाने की योजना बनायी. संतालों ने इसे सहर्ष स्वीकार कर लिया और यहां के जमीन को कृषि योग्य बना दिया. ईस्ट इंडिया कंपनी ने संतालों के रह रहे क्षेत्र को दामिन-इ-कोह के रूप में चिह्नित कर दिया. आदिवासियों में संताल जनजाति कृषि कार्य में काफ़ी कुशल मानी जाती है. लेकिन जल्द ही संतालों को ईस्ट इंडिया कंपनी और उनके जमींदारों के शोषण का शिकार होना पर गया.
ईस्ट इंडिया कंपनी एक व्यापारिक कंपनी थी, उसके आय का मुख्य स्रोत लगान था. दामिन-इ-कोह में खेती योग्य भूमि बढ़ने के बाद इस क्षेत्र से लगान की राशि बढ़ा दी गयी. महाजन संतालों को कुछ रुपये भी उधार दिया करते थे और फसल के मौसम के दौरान वे उधार दिये गये धन या वस्तु को एकत्र करते थे. यह भी पूरी चालबाजी के साथ किया जाता था. विद्रोह का व्यापक अध्ययन करने वाले इतिहासकार, कालिकिंकर दत्ता (1940) बताते हैं:
उन्होंने रास्ते में एक पत्थर उठाया और अपने वजन की शुद्धता दिखाने के लिए इसे सिंदूर से रंग दिया, अपने देनदारों के खेतों में पहुंचे, जिन्हें तब अपने लेनदारों की पार्टियों के आने-जाने के खर्चों को भी चुकाना होता था. इस तरह महाजनों ने संतालों को कर्ज के बोझ से दबा दिया. संतालों को देनदार के बंधुआ मजदूर के रूप में कार्य करने के लिए मजबूर होना होता और यह पीढ़ियों तक जारी रहता. इस व्यवस्था को ‘कमियोती’ के नाम से जाना जाता था.
उत्पीड़ित संतालों को पुलिस अधिकारियों से कभी कोई राहत नहीं मिली क्योंकि वे व्यापारियों और महाजनों के साथ होते. वहीं 1813 के चार्टर एक्ट ईसाई मिशनरियों को भारत में ईसाई धर्म के प्रचार प्रशार की इजाज़त दी. ये ईसाई मिशन भारत के अन्य हिस्से के अलावा संतालों की बस्तियों में भी प्रवेश करने लगे और हाट में जाकर ईसाई धर्म का प्रचार करने लगे. संताल जनजाति को ईसाई मिशनरियों की गतिविधियों से अपनी आस्था और विश्वास पर खतरा महसूस होने लगा और अंदर ही अंदर वे इससे नाराज होने लगे.
संताल परगना के इतिहासकार डॉ सुरेंद्र झा के अनुसार धर्मांतरण करने वालों को संताल परिवार से अलग कर देते थे. इससे स्पष्ट होता है कि संताल ईसाई मिशनरियों के क्रियाकलापों को अपनी संस्कृति और पहचान के लिए खतरा समझते थे. संताल हूल के पीछे उनके सामाजिक व्यवस्था पर अंग्रेजों द्वारा किये जा रहे प्रहार भी थे. अंग्रेजों ने उनकी पारंपरिक मांझी व्यवस्था और पारहा पंचायत व्यवस्था के स्थान पर अंग्रेजी कानून थोप दिये.
इन सब कारणों के बीच एक मामूली घटना ने असंतोष की चिंगारी को हवा दे दी. जून 1855 के महीने में एक चोरी की घटना में कई संतालों को पुलिस द्वारा पकड़ लिया गया और उनकी जम कर पिटायी की गयी. ग़ुस्सायी संतालों की भीड़ ने उस पुलिस इंस्पेक्टर को मार दिया और यही से हूल की शुरुआत हो गयी. 30 जून 1855 को सिदो-कान्हू भाइयों के नेतृत्व में क़रीब 6000 संताल भोगनाडीह में एकत्र हुए.
सिदो ने उन्हें बताया कि उनके देवता सिंह बोंगा उनके स्वप्न में आये थे और उन्हें दामिन ए कोह में अबुआ राज की स्थापना के लिए आदेश दिया है. देखते देखते यह विद्रोह दामिन ए कोह से निकल कर धनबाद, भागलपुर, सिंहभूम और वीरभूम तक पहुंच गया और विद्रोहियों के संख्या 6000 से 60000 तक पहुंच गयी. अंग्रेजों ने इस विद्रोह को कुचलने के लिये मार्शल लॉ लगा दिया और फ़ौज की सहायता से इस विद्रोह को कुचल दिया. सिदो कान्हू के अलावा करीब 15000 लोग शहीद हुए और हज़ारों को गिरफ्तार कर लिया गया.
1855 के अधिनियम XXXVII ने संताल परगना को जन्म दिया. यह क्षेत्र 5470 वर्ग माइल का था, जिसमें भागलपुर और वीरभूम जिले के हिस्से थे. दुमका को इसके प्रशासन का केंद्र बनाया गया. संताल परगना को नन रेग्युलेशन जिले का दर्जा दिया गया और यहां पर जो देश के प्रचलित सामान्य कानून थे जिन्हें संताल पसंद नहीं करते थे उससे उनको मुक्त रखा गया. संताल संस्कृति को देखते हुए एक नयी व्यवस्था लागू की गयी.
संताल परगना ज़िले को चार सब डिविज़न में बांटा गया जिसका प्रभार अलग अलग डिप्टी कमीशनर को दिया गया . इन डिप्टी कमिश्नर की सहायता के लिए चार असिस्टेंट कमिनशर नियुक्त किये गये. 1856 के पुलिस अधिनियम में संशोधन कर गांव के परंपरागत प्रधान को पुलिस की ज़िम्मेदारी सौंपी गयी.1872 में संताल परगना को स्थायी रूप से ननरेग्युलेशन जिले के रूप में मान्यता मिली. यह एक महत्वपूर्ण घटना थी जिसे संताल ने हूल के परिणाम के रूप में देखा गया.
दूसरा महत्वपूर्ण परिवर्तन जो हूल का परिणाम था वह संताल परगना काश्तकारी अधिनियम 1876 का लागू होना था. अंग्रेजों ने 1876 में संताल परगना काश्तकारी अधिनियम पारित किया जिसने आदिवासियों को शोषण के खिलाफ कुछ सुरक्षा प्रदान की. संताल परगना काश्तकारी अधिनियम, 1876 बंगाल के साथ झारखंड की सीमा के साथ संताल परगना क्षेत्र में गैर-आदिवासियों को आदिवासी भूमि की बिक्री पर रोक लगाता है.
तीसरी सबसे महत्वपूर्ण परिणाम हूल का यह था कि बंधुआ मज़दूरी की प्रथा को 1860 में डिप्टी कमिश्नर विलियम रॉबिंसन द्वारा समाप्त कर दिया गया. अंग्रेजों ने काफ़ी क्रूरता से हूल को कुचला था. उन्होंने गांव के गांव जला दिये थे और फसलों में आग लगा दी थी. 1865-66 में आये आकाल ने इनकी स्थिति और गंभीर कर दी. कंद मूल और कच्चे महुआ से वे पेट भरते रहे . इस दरम्यान कोलेरा से हज़ारों संताल की जान चली गई.एक बार फिर संताल महाजनो से क़र्ज़ लेना शुरू कर दिया.
कई सारे संताल वापस छोटनागपुर चले गये और कुछ गंगा पार कर पूर्णिया जिले में चले गये. संताल हूल की सबसे महत्वपूर्ण उपलब्धि संतालों की पहचान और अपने संस्कृति से जुड़ कर रहने की उनकी प्रवृति को बल देने वाली बनी. जल जंगल और ज़मीन से उनका लगाओ पूरी दुनिया को पता चला और उनमें सामूहिक चेतना का मजबूती से विकास हुआ. अबुआराज का उनका सपना आज़ादी के बाद झारखंड राज्य के निर्माण के रूप में सामने आया और शोषण से मुक्ति के लिए उनके आगे का मार्ग प्रशस्त हुआ.
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