चतरा में 9.30 करोड़ रुपये के घोटाले के केस में डीएसपी से इंस्पेक्टर तक ने की लापरवाही

By Prabhat Khabar Digital Desk
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रांची : चतरा सदर थाना में 9.30 करोड़ की सरकारी राशि के गबन के आरोप में सरकारी अधिकारी और कर्मियों के खिलाफ दर्ज केस में डीएसपी से लेकर इंस्पेक्टर तक ने लापरवाही बरती. यहीं नहीं चतरा एसपी ने भी समय पर केस में रिपोर्ट जारी नहीं की. इस बात का खुलासा पुलिस मुख्यालय के निर्देश पर हजारीबाग रेंज के डीआइजी पंकज कंबोज द्वारा केस में तैयार समीक्षा रिपोर्ट से होती है. डीआइजी ने रिपोर्ट में लिखा है कि आठ जून 2018 को कार्यपालक दंडाधिकारी सह प्रभारी जिला कल्याण पदाधिकारी की शिकायत पर सरकारी राशि के गबन को लेकर थाना में केस दर्ज हुआ था.

केस में तत्कालीन कार्यपालक पदाधिकारी आशुतोष कुमार, अवर निर्वाचन पदाधिकारी भोलानाथ लागुरी, नाजिर इंद्रदेव प्रसाद, सिद्धार्थ कुमार, सुनीता देवी, लक्ष्मी कुमारी, मनोज कुमार साव, राहुल प्रसाद, निर्मल प्रसाद मेहता, तुलसी प्रसाद, ताला बेला हेम्ब्रम, विलास राम, शांति विरोहनी संगीता देवी, मुरली श्याम, अभय कुमार, सजंती द्विवेदी, एबीबी सहाय, आशीष कुमार, टुनटुन कुमार मेहता, बरवा इचाक, मो शहाबुद्दीन, सूरज अग्रवाल, रूपा देवी, आशिष कुमार, मिथिलेश मिश्रा, सुनीता देवी, चंदा प्रसाद, तारा प्रसाद, पृथ्वी प्रसाद, सूरज प्रसाद व लक्ष्मी देवी को आरोपी बनाया गया था. चतरा एसडीपीओ ने 31 जनवरी 2019 को केस में सुपरविजन रिपोर्ट जारी की थी. उसके बाद 25 फरवरी को चतरा एसपी ने प्रगति रिपोर्ट जारी की. पुन: 14 मार्च 2019 को चतरा एसडीपीओ ने केस में प्रगति रिपोर्ट जारी की. लेकिन अभी तक चतरा एसपी ने केस में रिपोर्ट तीन जारी नहीं की.

डीआइजी ने और क्या लिखा रिपोर्ट में : केस के सुपरविजन में आरोपियों के खिलाफ आरोप सत्य पाये गये. समीक्षा के दौरान डीआइजी ने यह भी पाया कि केस में आरोपियों के खिलाफ आइपीसी की धारा 41 एक के तहत नोटिस जारी किया गया. इस संबंध में डीएसपी और पूर्व अनुसंधानक इंस्पेक्टर विनय प्रसाद मंडल ने बताया कि न्यायालय के निर्देश पर नोटिस जारी किया गया. लेकिन वे न्यायालय का कोई आदेश प्रस्तुत नहीं कर पाये.

डीआइजी ने आगे लिखा है कि केस गंभीर प्रकृति का है. ऐसी स्थिति में आरोपियों के खिलाफ नोटिस जारी नहीं किया जाना था. इसलिए ऐसा लगता है कि नोटिस आरोपियों को लाभ पहुंचाने के लिए जारी किया गया था. केस में डीआइजी ने इंस्पेक्टर को शोकॉज भी किया है. 14 जून 2019 को 12 आरोपियों ने अग्रिम जमानत के लिए न्यायालय में आवेदन दिया था.

जिसे बाद में वापस ले लिया गया. जिसके कारण उनके खिलाफ पीड़क कार्रवाई पर रोक का आदेश भी हट गया. पुलिस मुख्यालय को मामले में एक शिकायत मिली थी कि पूर्व नाजिर इंद्रदेव प्रसाद द्वारा अपने बचाव के लिए कई तरह के षडयंत किये जाने है. जिसके कारण ही वह केस में विनय प्रसाद मंडल और डीएसपी वरुण कुमार रजक को मैनेज करने में सफल हुआ. यह काम उसने सिल्ली में पदस्थापित डीएसपी और रिश्तेदार के सहयोग से किया है.

शिकायत में नाजिर के लड़के द्वारा चतरा डीएसपी को 16 लाख रुपये देने के भी आरोप थे. डीआइजी ने इस शिकायत पर जांच करने का निर्देश चतरा एसपी को दिया था. साथ ही केस में अपटेड रिपोर्ट की मांग की गयी थी. लेकिन चतरा एसपी ने न ही रिपोर्ट दी और न ही जांच की या जांच करायी.

लंबे समय तक बाधित रखा गया अनुसंधान : डीआइजी ने डीएसपी वरुण रजक से आरोप के संबंध में पूछताछ की, तब उन्हें बताया गया कि सिल्ली डीएसपी उनके बैचमेट हैं. सिल्ली डीएसपी को साथ लेकर नाजिर का बेटा डीएसपी वरुण रजक के पास केस के सिलसिले में मिलने गया था.

डीआइजी ने रिपोर्ट में आगे लिखा है कि केस में डीएसपी और अनुसंधानक के स्तर से लापरवाही बरती गयी है. इसलिए इनकी मिलीभगत से इनकार नहीं किया जा सकता. चतरा एसपी ने भी डीआइजी के आदेश को हल्के में लेते हुए मामले को ठंडे बस्ते में डाल दिया. केस के पूर्व के अनुसंधानक विनय प्रसाद मंडल या वर्तमान इंस्पेक्टर प्रमोद पांडेय ने भी पीड़क कार्रवाई पर रोक हट जाने के बावजूद आरोपियों को गिरफ्तार नहीं किया.

डीआइजी की रिपोर्ट के अनुसार इस केस का अनुसंधान लंबे समय से बाधित करके रखा गया. दूसरी जांच एजेंसी से अनुसंधान की अनुशंसा की आड़ में आरोपियों को करीब 1.5 वर्षों तक लाभ पहुंचाया गया. इस केस में चतरा एसपी के कार्यालय के कर्मियों की लापरवाही से इनकार नहीं किया जा सकता है. लिहाजा इस केस का अनुसंधान दूसरी एजेंसी नहीं करेगी. केस का अनुसंधान जिला पुलिस ही करेगी.

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