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Sawan 2025: झारखंड का शिव मंदिर, जहां सीता और लक्ष्मण के साथ आए थे भगवान श्रीराम, ईचागढ़ राजा ने रखवायी थी नींव

Updated at : 19 Jul 2025 7:22 PM (IST)
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Jayda Shiv Temple Chandil

जयदा बूढ़ा बाबा शिव मंदिर

Sawan 2025: टाटा-रांची हाईवे पर सुवर्णरेखा नदी के तट पर प्राचीन जयदा बूढ़ा बाबा शिव मंदिर है. यह कोल्हान के लोगों के लिए आस्था का केंद्र है. प्रकृति की गोद में बसा यह इलाका सावन में हर-हर महादेव के जयघोष से गूंजता रहता है. इस मंदिर की नींव ईंचागढ़ राजा विक्रमादित्यदेव ने रखवायी थी. कहते हैं कि माता सीता और भाई ल्क्ष्मण के साथ भगवान श्रीराम यहां आए थे.

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Sawan 2025: सरायकेला/चांडिल (शचिंद्र कुमार दाश/हिमांशु गोप)-सरायकेला से करीब 45 किमी दूर टाटा-रांची हाईवे पर सुवर्णरेखा नदी के तट पर है प्राचीन जयदा बूढ़ा बाबा शिव मंदिर. भगवान शिव का यह मंदिर चांडिल ही नहीं, बल्कि पूरे कोल्हान के लोगों के लिए आस्था का केंद्र है. मंदिर परिसर में प्राचीन शिवलिंग के अलावा मां पार्वती, हनुमान, नंदी आदि का भी मंदिर है. पूरे सावन माह यहां मंदिर और आसपास के इलाके में हर-हर महादेव का उद्घोष होता रहता है. मंदिर के पीछे हरा-भरा जंगल और पहाड़ है. चांडिल के पास हाईवे से यह अनोखा और मनमोहक लगता है. कुछ वर्ष पूर्व ही पर्यटन विभाग की ओर से मंदिर क्षेत्र में कई कार्य कराये गये हैं. यहां पहुंचने के लिए पक्की सड़क बनाई गई है. यहां पहुंचने वाले श्रद्धालुओं की सुविधा के लिए भी कई कार्य किये गये हैं. कहा जाता है कि 14 साल के वनवास के दौरान प्रभु श्री राम, लक्ष्मण और मां सीता के साथ जयदा सुवर्णरेखा नदी के किनारे रुके थे. पत्थर पर उनके घुटने के निशान हैं.

ईचागढ़ राजा की देखरेख में रखी गयी जयदा मंदिर की नींव

18वीं और 19वीं सदी के मध्यकालीन दिनों में केरा (खरसावां) के राजा जयदेव सिंह सुवर्णरेखा नदी किनारे स्थित पहाड़ी पर शिकार करने गए थे. उन पर जयदा बूढ़ा बाबा की कृपा हुई. कुछ दिनों के भीतर महाराज जयदेव सिंह को सपना आया. प्रेरणा लेकर उन्होंने ईचागढ़ के राजा विक्रमादित्यदेव को जयदा बूढ़ा बाबा के बारे में जानकारी दी. इसके बाद ईचागढ़ राजा की देखरेख में जयदा मंदिर की नींव रखी गई. मंदिर का इतिहास मंदिर के समीप एक पट पर लिखा गया है. इससे श्रद्धालुओं को मंदिर के बारे में पूरी जानकारी मिलती है. इस पावन तीर्थ धाम पर 1966 में महंत श्री ब्रम्हानंद सरस्वती जी का आवगमन हुआ था. कठोर तपस्या से संतुष्ट होकर जयदा बूढ़ा बाबा मंदिर के निमार्ण का स्वपनादेश मिला. कठिन परिश्रम एवं शिव भक्तों के सहयोग से 1971 में मंदिर निर्माण का कार्य शुरू हुआ. यह वर्तमान समय तक जारी है.

जयदा से पश्चिम बंगाल के प्रसिद्ध बाड़ेदा शिव मंदिर जल लेकर जाते हैं कांवरियां


टाटा-रांची मार्ग संख्या 33 पर सुवर्णरेखा नदी किनारे पहाड़ों की गोद में विहंगम दृश्य है. चांडिल के प्राचीन कालीन जयदा शिव मंदिर में भक्त पवित्र सावन महीने में सुवर्णरेखा नदी में स्नान कर बाबा भोलेनाथ को जलाभिषेक करते हैं. उसके बाद कांवर में सुवर्णरेखा नदी से अपने-अपने कांवर में जल भरकर कांवरियां पश्चिम बंगाल के पुरुलिया जिल के प्राचीन कालीन प्रसिद्ध बाड़ेदा शिव मंदिर ( बाड़ेदा बाबा) में जलाभिषेक करने के लिए जाते हैं.

मंदिर में श्रद्धालुओं के लिए खास व्यवस्था

बारिश के दिनों में सुवर्णरेखा नदी पर पानी का बहाव तेज होने के कारण नदी के तट को बैरिकेड कर दिया गया है. मंदिर परिसर में दूरदराज से आने वाले श्रद्धालुओं की ठहरने की व्यवस्था है. यहां मंदिर में पूजा-अर्चना करने वाले श्रद्धालुओं की कतार में लगने की व्यवस्था के साथ जूना अखाड़ा व स्थानीय ग्रामीणों के सैकड़ों स्वयंसेवक तैनात रहते हैं. वर्तमान में मंदिर का संचालन जूना अखाड़ा के महंत केशवानंद सरस्वती कर रहे हैं.

जयदा शिव मंदिर कैसे पहुंचें?

टाटा-रांची मुख्य मार्ग एनएच-33 जमशेदपुर से लगभग 45 किमी और रांची से 100 किमी दूर पर्वत की गोद में प्राचीन जयदा शिव मंदिर है. जमशेदपुर से आने के दौरान चांडिल गोलचक्कर पार करने बाद महज 4 किमी और रांची से आने के क्रम में चौका पार करने बाद 6 किमी पर जयदा शिव मंदिर है. रांची और जमशेदपुर से आने दौरान जयदा ब्रिज से एनएच-33 से एक किमी की दूरी पर है.

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Guru Swarup Mishra

लेखक के बारे में

By Guru Swarup Mishra

मैं गुरुस्वरूप मिश्रा. फिलवक्त डिजिटल मीडिया में कार्यरत. वर्ष 2008 से इलेक्ट्रॉनिक मीडिया से पत्रकारिता की शुरुआत. आकाशवाणी रांची में आकस्मिक समाचार वाचक रहा. प्रिंट मीडिया (हिन्दुस्तान और पंचायतनामा) में फील्ड रिपोर्टिंग की. दैनिक भास्कर के लिए फ्रीलांसिंग. पत्रकारिता में डेढ़ दशक से अधिक का अनुभव. रांची विश्वविद्यालय से पत्रकारिता में एमए. 2020 और 2022 में लाडली मीडिया अवार्ड.

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