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देखते-देखते खत्म हो गयी करगली कोलियरी की रौनक

Updated at : 31 Mar 2024 11:11 PM (IST)
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देखते-देखते खत्म हो गयी करगली कोलियरी की रौनक

देखते-देखते खत्म हो गयी करगली कोलियरी की रौनक

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राकेश वर्मा, बेरमो : बेरमो कोयला क्षेत्र अंतर्गत बीएंडके एरिया की करगली कोलियरी का कभी अलग रौनक थी. लेकिन अब यह अतीत के पन्नों में सिमट कर रह गयी है. कभी कोयला उत्पादन में बेहतर प्रदर्शन करने वाली इस कोलियरी से वर्षों से उत्पादन बंद है. इसके एक नंबर क्वायरी में छाई भरी गयी और दो नंबर क्वायरी में पानी भर गया है. वर्ष 2014-15 तक यहां से सालाना दो लाख टन के आसपास कोयला उत्पादन होता रहा. इसके बाद 2017-18 में भी छिटपुट उत्पादन हुआ. 2019 से सीटीओ (कंसेप्ट टू ऑपरेट) लैप्स करने के कारण उत्पादन पूरी तरह से ठप हो गया. इस कोलियरी को कुछ साल पहले कारो एरिया परियोजना के साथ मर्ज कर दिया गया था. बाद में बोकारो कोलियरी के साथ मर्ज कर दिया गया. बोकारो कोलियरी के पीओ अरविंद कुमार शर्मा इस कोलियरी के पीओ हैं. बीएनआर रेलवे ने 1914 में शुरू की थी यह कोलियरी वर्ष 1914 में अंग्रेजों के जमाने में बीएनआर रेलवे ने करगली कोलियरी शुरू की थी. एक जनवरी 1934 को इस कोलियरी का अपना एक भव्य ऑफिस बनाया गया. एक अप्रैल 1944 से यह कोलियरी सेंट्रल गर्वमेंट के अधीन आ गयी. एक अक्टूबर 1956 से यह कोलियरी एनसीडीसी के अधीन तथा एक जनवरी 1975 से यह सीसीएल के मातहत आ गयी. शुरुआती दौर में इस कोलियरी में दो भूमिगत खदानें 12 फीट सीम इंकलाइन तथा 70 फीट सीम इंकलाइन के अलावा तीन बड़ी खुली खदानें एक नंबर क्वायरी, दो नंबर क्वायरी और तीन नंबर क्वायरी (ढोरी पैच) थी. इसके अलावा बेरमो सीम इंकलाइन व कारो सीम इंकलाइन भी करगली कोलियरी के ही अधीन थी. कोलियरी के ऑफिस में 25-30 क्लर्क (ओएस) तथा दो दर्जन पिउन हुआ करते थे. पिउन के हेड रामदेव तिवारी थे. कोलियरी के इस ऑफिस में गिरिराज भटनागर तथा हीरालाल सिन्हा चर्चित सीनियर क्लर्क (ओएस) हुआ करते थे. गिरिराज भटनागर आरके भटनागर के पिताजी थे. आरके भटनागर सीजीएम होकर सेवानिवृत्त् हुए थे जो बाद में एकीकृत बिहार के मुख्यमंत्री सह इंटक के दिग्गज नेता बिंदेश्वरी दुबे के निजी सचिव भी बने. गिरिराज भटनागर तथा हीरालाल सिन्हा ने ही 40 के दशक में करगली में दुर्गा पूजा की शुरुआत की थी. इसी कोलियरी में उस वक्त के श्रमिक नेता रामदास सिंह एवं संतन सिंह के अलावा केपी सिंह व बेरमो के पुराने खानगी मालिक रामबिलास सिंह भी नौकरी किया करते थे. करगली में था सेंट्रल पे ऑफिस करगली कोलियरी के ऑफिस से सटा सेंट्रल पे ऑफिस (सीपीओ) हुआ करता था. इसमें कोलियरी के मजदूरों व बाबूओं सहित अधिकारियों का वेतन भुगतान किया जाता था. सीपीओ में एमआर (मंथली रेटेड) तथा डीआर (डेली रेटेड) का पेमेंट किया जाता था. करगली कोलियरी के ऑफिस में ही कोलियरी के सारे एचओडी (अधिकारी) बैठते थे. मुख्यत: उस वक्त यह मैनेजर का ऑफिस हुआ करता था. इस कार्यालय में बिल, सिविल तथा एक्सवेंशन से संबंधित फाइलें रहती थीं. अब ऑफिस में पहले वाली रौनक नहीं रही. आज भी कुछ बाबू कार्यरत हैं. एमजी फेल के आते ही कार्यालय में हो जाता था पिन ड्रॉप साइलेंस कहते हैं 40 के दशक में करगली कोलियरी में सख्त अंग्रेज ऑफिसर एमजी फैल सीनियर मैनेजर/पीओ हुआ करते थे. हाफ पैंट, माथे पर टोपी तथा हाथ में डंडा रहता था. उनके कार्यालय आते ही पूरे ऑफिस में पिन ड्रॉप साइलेंस हो जाता था. ऑफिस के पुराने ओएस एसके सेन गुप्ता कहते हैं कि एमजी फैल के ऑफिस आने से पहले उनका कुत्ता यहां आ जाता था. एमजी फैल यहां वर्ष 1945 से 54 तक रहे. इसके बाद 1954 से 56 तक सी बलराम, 1956 से 58 तक आरएस माथुर, 1958 से 60 तक टीवी लक्ष्मण, 1960 दिसंबर तक पीके मल्लिक, 1960 से 61 तक सीआर भट्टाचार्य, 1961 से 63 तक एस ज्ञानेश्वरण, 1964 से 68 तक डीपी गुप्ता सीनियर मैनेजर/पीओ के पद पर रहे. बाद में एसएन भट्टाचार्य, जेएन शंकर, पीआर सिन्हा के अलावा एनके सिंह, आरके पाठक, टीएफए खान जैसे अधिकारी इस पद पर रहे. कई अधिकारी सीएमडी व डीटी भी बने. पीआर सिन्हा सीएमडी बने तो एनके सिंह डीटी बने. वीटी कपूर सीसीएल के चीफ एडमिनिस्ट्रेशन के पद से रिटायर हुए. हाइवाल माइनिंग के लिए आस्ट्रेलिया की एक कंपनी ने की थी स्टडी वर्ष 2023 में आस्ट्रेलिया की एक कंपनी ने करगली कोलियरी में हाइवाल माइनिंग पद्धति से कोयला उत्पादन शुरू करने की दिशा में पहल की. कंपनी के प्रतिनिधियों ने यहां आकर स्टडी की थी. इसके बाद सीएमपीडीआइ ने यहां चार बोर होल भी कराया. इसकी रिपोर्ट कंपनी को सबमीट की जानी थी. प्रबंधकीय सूत्रों के अनुसार इस कोलियरी को चलाने के लिए फिलहाल कोई फ्यूचर प्लानिंग नहीं है. कोलियरी का मैन पावर 200 से ज्यादा है. इस कोलियरी के अधीन एरिया की कई कॉलोनियों में जलापूर्ति व बिजली आपूर्ति व्यवस्था की देखरेख की जाती है. इस कोलियरी का मासिक बजट दो-तीन करोड़ रुपये है.

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