आधी आबादी: मंजिल हासिल करके ही दम लिया, जानें कौन हैं प्रो पल्लवी प्रवीण?

Updated at : 23 Aug 2022 9:09 AM (IST)
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आधी आबादी: मंजिल हासिल करके ही दम लिया, जानें कौन हैं प्रो पल्लवी प्रवीण?

इस बार आधी आबादी के अंक में पढ़िए बोकारो की ऐसी ही चंद महिलाओं की कहानी उनकी जुबानी, जिन्होंने बताया कि एक महिला जब कुछ ठान लेती है तो उसे कोई भी ताकत मंजिल तक पहुंचने से नहीं रोक सकती. पेश है चीफ सब एडिटर कृष्णाकांत सिंह की रिपोर्ट...

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आधी आबादी: पल्लवी प्रवीण वर्तमान में बोकारो स्टील सिटी कॉलेज में बॉटनी व बायोटेक्नोलॉली विभाग की एचओडी हैं. उनका जन्म बिहार के भागलपुर जिला के एक मध्यमवर्गीय परिवार में हुआ था. उनके माता-पिता विश्वविद्यालय में प्रोफेसर थे. नाना और मौसी भी शिक्षा के क्षेत्र में थे. ऐसे में उनका बचपन बौद्धिक वातावरण में विकसित होना स्वाभाविक था. यही कारण रहा कि शुरू से ही पठन-पाठन में उनकी रुचि बढ़ती गयी और आज प्रोफेसर बन कर विद्यार्थियों को उनकी दिशा तय करने में महत्वपूर्ण भूमिका अदा कर रही हैं. प्रो पल्लवी पढ़ने में कैसी थी इसका अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि स्नातक में स्वर्ण पदक मिला और स्नातकोत्तर में भी इसे बरकरार रखा. इसी बीच उनकी शादी हो गयी और फिर एक पुत्री का जन्म हुआ.

काफी संघर्षों के बाद पीएचडी में नियुक्त

पल्लवी प्रवीण का अगला कदम था पीएचडी की उपाधि प्राप्त करना. हालांकि ऐसा कर पाना आसान नहीं था. छोटी बच्ची, प्रयोगशाला में रोजाना आठ से दस घंटे गुजारना. तमाम झंझावतों से गुजरते हुए मंजिल हासिल करके ही दम लिया. इस काम में माता-पिता और उनके पति ने बखूबी साथ दिया. उनलोगों ने यह कहते हुए हर समय प्रोत्साहित किया कि तुम कर सकती हो. इसके बाद वे स्थायी रूप से बोकारो में रहने लगी. चूंकि पति सेल में थे और पूरा परिवार एक साथ था तो गृहस्थी निभाने में कोई दिक्कत नहीं हुई. सब कुछ ठीक था लेकिन अवसर नहीं मिलने के कारण मंजिल नहीं मिलने की कसक थी. बार-बार मन में बातें उठती थी कि क्या मेरी पढ़ाई बेकार चली जायेगी. लेकिन मुझे विश्वास था कि सब ठीक होगा. इसके बाद एक स्कूल में बच्चों को पढ़ाने लगी. फिर 2008 का साल जीवन में नया मोड़ लेकर आया. अवसर मिला और विश्वविद्यालय में नियुक्त हो गयी. हालांकि यहां भी काफी संघर्ष करना पड़ा.

झेलती रही स्थानांतरण का कष्ट

वह स्थानांतरण का कष्ट झेलती रही. चूंकि बोकारो से बाहर नहीं जा सकती थी, क्योंकि पूरा परिवार गृह कार्य के लिए मुझ पर ही आश्रित था. आज बॉटनी व बायोटेक्नोलॉली दोनों विभाग की जिम्मेदारी उनके पास ही है. बकौल प्रो पल्लवी कार्य कठिन जरूर है, लेकिन जिस पेशे में हूं वहां जिम्मेदारी से पीछे कैसे हट सकती हूं. मेरा यह सौभाग्य है कि मैं शुरू से ही सशक्त स्त्रियों के बीच रही हूं. समर्पण और कर्तव्यनिष्ठा बचपन से ही मेरी रगों में ही रहा है. मैं नेता नहीं हूं कि मैं किसी को संदेश दूं. बस युवा पीढ़ी को मेरा सुझाव है कि परिश्रम करें. असफलता से घबराएं नहीं. अपनी अभिरुचि के क्षेत्र का चयन करें. अपने कार्य क्षेत्र के प्रति लगाव ही सफलता की कुंजी है.

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