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Bokaro News: बांस कला की परंपरा को नया जीवन दे रहे हैं पिरगुल गांव के 25 कालिंदी परिवार

Updated at : 04 Nov 2025 12:15 AM (IST)
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Bokaro News: बांस कला की परंपरा को नया जीवन दे रहे हैं पिरगुल गांव के 25 कालिंदी परिवार

Bokaro News: यह कला सिर्फ बड़ों तक सीमित नहीं है. गांव के पांच-सात साल के बच्चे भी बांस काटने, मोड़ने और बुनने में माहिर हैं. वे अपने माता-पिता के साथ बैठकर पारंपरिक शैली में वस्तुएं बनाते हैं. यह परंपरा अब उनके जीवन और संस्कृति का हिस्सा बन चुकी है.

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बोकारो जिला स्थित कसमार प्रखंड का पिरगुल गांव अपने विशेष हस्तशिल्प बैंबू वर्क के लिए प्रसिद्ध है. बोकारो के कई गांव अपने उत्पादों से पहचाने जाते हैं, परंतु बांस कला के मामले में ऐसा माना जाता है कि जिले में पिरगुल बेजोड़ है. यहां के कारीगरों ने न केवल इस परंपरा को जिंदा रखा है, बल्कि इसे आधुनिकता के साथ जोड़ने की दिशा में भी कदम बढ़ाया है. गांव के लगभग 25 कालिंदी परिवार सदियों से बांस कार्य में लगे हुए हैं. प्रत्येक परिवार औसतन सप्ताह में 100 वस्तुएं तैयार करता है. छठ, काली पूजा, विवाह जैसे अवसरों पर उत्पादन दोगुना हो जाता है. महीनेभर में यहां से लगभग 10 हजार बांस आधारित वस्तुएं तैयार होती हैं, जिनमें सूप, टोकरी, झाड़ू जैसे पारंपरिक उत्पादों के साथ गुलदस्ता, टिफिन बॉक्स, पेन स्टैंड, लेडीज पर्स और गृह सज्जा की सामग्री शामिल हैं.

प्रशिक्षण से कला को मिला नया आयाम

वर्ष 2017 में ग्रामीण विकास मंत्रालय, भारत सरकार के निर्देश पर नेशनल एकेडमी ऑफ रूडसेटी (बेंगलुरु) और बैंक ऑफ इंडिया प्रायोजित आर एस ई टी ई बोकारो के सहयोग से गांव में एक माह का प्रशिक्षण कार्यक्रम हुआ था. इस प्रशिक्षण ने कारीगरों को आधुनिक डिजाइन और नई तकनीकों से परिचित कराया. अब पिरगुल के कारीगर पारंपरिक वस्तुओं के साथ-साथ डिज़ाइनर और उपयोगी उत्पाद भी बनाने लगे हैं.

पूंजी और बाजार की बड़ी चुनौती

कारीगरों का कहना है कि पूंजी की कमी उनकी सबसे बड़ी समस्या है. बैंक से लोन न मिलने के कारण वे उत्पादन बढ़ा नहीं पा रहे. कारीगर प्रेमचंद कालिंदी, नुनु कालिंदी, सुनील कालिंदी, सनोज कालिंदी, फ़ुतनु कालिंदी, राकेश कालिंदी, मेघु कालिंदी, भरत कालिंदी, नीतू देवी, रीता देवी, मीना देवी, भारती देवी और मंगली देवी कहते हैं कि अगर हमें आर्थिक सहयोग और बाजार की सुविधा मिल जाए, तो पिरगुल गांव पूरे राज्य में अपनी छाप छोड़ सकता है.

राज्यभर में है उत्पादों की मांग

पिरगुल की बांस सामग्रियां अपनी मजबूती और टिकाऊपन के कारण प्रसिद्ध हैं. इनके उत्पादों की मांग रामगढ़, हजारीबाग, रांची, कोडरमा, गिरिडीह और पलामू तक है. व्यापारी यहां आकर सीधे खरीदारी करते हैं और उत्पादों को विभिन्न बाजारों तक पहुंचाते हैं.

भविष्य की राह : हुनर से विकास की दिशा

ग्रामीणों का मानना है कि यदि सरकार या स्थानीय प्रशासन की ओर से स्थायी हस्तशिल्प केंद्र, सहकारी समिति और विपणन तंत्र की स्थापना की जाए, तो यह गांव राज्य स्तर का बैंबू हब बन सकता है. पिरगुल की कहानी यह साबित करती है कि हुनर अगर परंपरा से जुड़ा हो, तो बांस की लचक में भी भविष्य की मजबूती गढ़ी जा सकती है.

डिस्क्लेमर: यह प्रभात खबर समाचार पत्र की ऑटोमेटेड न्यूज फीड है. इसे प्रभात खबर डॉट कॉम की टीम ने संपादित नहीं किया है

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MAYANK TIWARI

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By MAYANK TIWARI

MAYANK TIWARI is a contributor at Prabhat Khabar.

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