Bokaro News : भेंडरा की अर्थव्यवस्था को मजबूती देता है 10 दिनों का मेला

Published by : JANAK SINGH CHOUDHARY Updated At : 21 Jan 2026 12:07 AM

विज्ञापन

Bokaro News : नावाडीह प्रखंड के भेंडरा गांव की पहचान लौह नगरी के रूप में है.

विज्ञापन

बोकारो, धनबाद व गिरिडीह जिलों के सीमावर्ती क्षेत्र में बसे बोकारो जिले के नावाडीह प्रखंड के भेंडरा गांव की पहचान लौह नगरी के रूप में है. मकर संक्रांति के अवसर पर हर वर्ष 16 जनवरी से यहां मां जलेश्वरी मेला का आयोजन होता है. 94 वर्षों से लग रहा यह मेला लोहे के औजारों और हस्तनिर्मित वस्तुओं के लिए प्रसिद्ध है. यह मेला भेंडरा गांव की अर्थव्यवस्था को मजबूती देता है. सात से 10 दिनों तक चलने वाले इस मेले में तीन करोड़ रुपये से अधिक का कारोबार होता है. मेले में लौह सामग्री की 50 से अधिक दुकानें लगी हैं. प्रत्येक दिन एक दुकान में 30 से 40 हजार रुपये की बिक्री हो रही है़

मेले की तैयारी यहां के कारीगर एक माह पहले से शुरू कर देते हैं. गांव में लगे लघु कुटीर उद्योग में कारीगर दिन-रात काम में जुटे रहते हैं. 100 से अधिक कारीगरों की ऑटोमेटिक भट्टियां में कार्य चलता है. प्रतिदिन पांच-सात टन लौह सामग्री का उत्पादन यह गांव करता है. मेले में भेंडरा के कारीगरों के हस्त निर्मित लौह सामग्री की अच्छी मांग रहती है. गांव की आबादी 10 हजार से अधिक है.

मेला कमेटी के अध्यक्ष भेंडरा मुखिया नरेश कुमार विश्वकर्मा, सचिव गोपाल विश्वकर्मा, कोषाध्यक्ष रवींद्र कुमार सिंह, उप सचिव ललित रविदास, संरक्षक समाजसेवी मुरली सिंह. संयोजक राजेंद्र विश्वकर्मा आदि ने बताया कि इस मेले को राज्य स्तरीय दर्जा दिलाने के लिए प्रयास किया जा रहा है. इस मेला की शुरुआत भेंडरा के कमलनाथ गोस्वामी ने जवादराम बरई, हीरालाल सिंह, गोपाल तुरी, चरण राम बरई के सहयोग से वर्ष 1932 में की थी. पहले यहां तीन दिन का ही मेला लगता था. इस वर्ष 10 दिनों का आयोजन है. राज्य के कई जिलों व दूर-दूराज क्षेत्र से लोग मेला में आते हैं. मेला लगभग 3.5 एकड़ एरिया में लगता है. कई तरफ से आवागमन के लिए पथ है. इसके कारण जाम की समस्या नही होती है.

कृषि व घरेलू उपयोग वाले औजारों की अधिक होती है बिक्री

भेंडरा मेले में सबसे अधिक बिक्री कृषि व घरेलू उपयोग वाले औजारों की होती है. इसमें कुदाल, खुरपी, हंसुआ, टांगी, बसुला, रंदा, बटाली, आरी, कलछुल, कड़ाही, डेगची, झंझरा, झगर, ताला, बक्सा, कुर्सी, सिकड़, बेलचा, गैता, शॉवल, ड्रील, बेना, कैची, उस्तूरा, नहेनी, तलवार, कुल्हाड़ी, कटार, तावा, ताला, चूल्हा आदि शामिल हैं. इसके अलावे रेलवे, कोयला खदान, भवन निर्माण, चाय बगान तक के लिए आवश्यक औजार आपूर्ति करने का गौरव यहां के कारिगरों को हासिल है.

मां जलेश्वरी की पूजा के लिए भी होती है भीड़

जमुनियां नदी तट पर लगने वाले इस मेले में प्रतिदिन भीड़ हो रही है. प्रतिदिन हजारों श्रद्धालु

मां जलेश्वरी की पूजा करते हैं. शाम में जमुनियां नदी तट पर गंगा आरती होती है. मेले में झूले, मौत का कुआं, मीना बाजार, खाने-पीने के स्टॉल भी लगे हैं. भेंडरा की दूरी धनबाद के गोमो रेलवे स्टेशन से मात्र पांच किमी, जीटी रोड गलागी से और किमी, नावाडीह से नौ किमी तथा चंद्रपुरा से 20 किमी है.

इतिहास के पन्नों में है भेंडरा का जिक्र

भेंडरा गांव में हथियार बनाने का इतिहास काफी पुराना है. राजा शेरशाह की सेना के लिए यहां गुप्त रूप से हथियार बनाये जाते थे. 1540 ई में शेरशाह व हिमायूं के बीच हुए युद्ध में शेरशाह की सेना को यही से तलवार, भाला जैसे हथियार भेजे गये थे. इसके बल पर शेरशाह से हिमायूं को परास्त किया था. इसका जिक्र इतिहास के पन्नों पर भी है, जिसमें पारसनाथ की तलहटी में नदी किनारे बसे गांव में हथियार बनाने का उल्लेख है. इसके आलावे द्वितीय विश्वयुद्ध व 1960 -62 में चीन के साथ भारत के हुए युद्ध में भी व्यापक पैमाने पर यहां के निर्मित हथियार का इस्तेमाल किया गया था. आजादी के बाद अमेरिका की टीम बिहार सरकार के आग्रह पर भेंडरा गांव का सर्वेक्षण करने आयी थी. टीम यहां के घर-घर में हथियार बनता देख दंग रह गये थे तथा इसे शेफील्ड ऑफ बिहार कहा था.

डिस्क्लेमर: यह प्रभात खबर समाचार पत्र की ऑटोमेटेड न्यूज फीड है. इसे प्रभात खबर डॉट कॉम की टीम ने संपादित नहीं किया है

विज्ञापन
JANAK SINGH CHOUDHARY

लेखक के बारे में

By JANAK SINGH CHOUDHARY

Prabhat Khabar App :

देश, एजुकेशन, मनोरंजन, बिजनेस अपडेट, धर्म, क्रिकेट, राशिफल की ताजा खबरें पढ़ें यहां. रोजाना की ब्रेकिंग हिंदी न्यूज और लाइव न्यूज कवरेज के लिए डाउनलोड करिए

Download from Google PlayDownload from App Store
विज्ञापन
Sponsored Linksby Taboola