सरना महाधर्म सम्मेलन : संतालियों के गौरवशाली अतीत से जुड़ा है लुगूबुरू घंटाबाड़ी
Published by : Prabhat Khabar Digital Desk Updated At : 20 Nov 2018 5:02 PM
बेरमो : लुगूबुरु घंटाबाड़ी धोरोमगढ़ से संतालियों का गौरवशाली अतीत जुड़ा हुआ है. बोकारो जिले के बेरमो अनुमंडल अंतर्गत गोमिया प्रखंड के ललपनिया स्थित इस धर्मस्थल के प्रति संतालियों की असीम आस्था है. संतालियों की मान्यता है कि हजारों वर्ष पूर्व उनके पूर्वजों ने लुगू पहाड़ की तलहटी स्थित दोरबारी चट्टान में लुगूबाबा अर्थात भगवान […]
बेरमो : लुगूबुरु घंटाबाड़ी धोरोमगढ़ से संतालियों का गौरवशाली अतीत जुड़ा हुआ है. बोकारो जिले के बेरमो अनुमंडल अंतर्गत गोमिया प्रखंड के ललपनिया स्थित इस धर्मस्थल के प्रति संतालियों की असीम आस्था है. संतालियों की मान्यता है कि हजारों वर्ष पूर्व उनके पूर्वजों ने लुगू पहाड़ की तलहटी स्थित दोरबारी चट्टान में लुगूबाबा अर्थात भगवान शिव की अध्यक्षता में निरंतर 12 वर्ष तक बैठक कर उनके सामाजिक संविधान एवं संस्कृति की रचना की थी, जिसका पालन आज भी संताली समुदाय के लोग करते आ रहे हैं.
संतालियों का मानना है कि संताली सहित अन्य समुदाय के जो लोग यहां लुगूबाबा की पूजा-अर्चना करते हैं, उनकी मनोकामना जरूर पूरी होती है. संतालियों के हर पूजन के विधि-विधान एवं कर्मकांडों में लुगूबुरु का जिक्र किया जाता है. इस समुदाय के लोकनृत्य एवं लोकगीत बिना घंटाबाड़ी के जिक्र के पूर्ण नहीं होता.
यह परंपरा हजारों वर्ष पूर्व से संतालियों के बीच प्रचलित है, जो लुगुबुरू के प्रति संतालियों की अटूट आस्था व विश्वास का प्रतीक है. संताली समुदाय के दशहरा के मौके पर किये जाने वाले लोकनृत्य दशांय में भी लुगूबुरु घंटाबाड़ी धोरोमगढ़ का जिक्र किया जाता है. पुराने लोग बताते हैं कि लुगूबुरु घंटाबाड़ी धोरोमगढ़ के आसपास चट्टानों की भरमार है, जो संताली समुदाय के बीच दोरबारी चट्टान के नाम से विख्यात है.
कहा जाता है कि इन्हीं चट्टानों को आसन के तौर पर इस्तेमाल कर इनके पूर्वज हजारों वर्ष पूर्व यहां दरबार लगाया करते थे. घंटाबाड़ी स्थित दोरबारी चट्टान के लगभग आधा दर्जन चट्टानों में संतालियों के पूर्वजों ने गड्ढा कर ओखली के रूप में उपयोग किया था, जो आज भी मौजूद है. इनमें कुछेक देखरेख के अभाव में भर गये हैं, लेकिन कई आज भी अपने पुराने स्वरूप में मौजूद हैं.
बताया जाता है कि इन्हीं ओखलियों में संतालियों के पूर्वज धान आदि कूटा करते थे. बांग्लादेश, नेपाल, भूटान, इंडोनेशिया और श्रीलंका से संताली समुदाय यहां काफी संख्या में हर साल मत्था टेकने आते हैं. संताली धर्म सम्मेलन में देश के कोने कोने से संताली परिवारों का आना तो होता ही है, विदेशी मेहमान के आने से सम्मेलन स्थल पर चार चांद लगता है.
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