जिनकी जमीन से रोशन जहां, उन्हीं के घर में छाया अंधेरा

Updated at : 16 Nov 2018 7:46 AM (IST)
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जिनकी जमीन से रोशन जहां, उन्हीं के घर में छाया अंधेरा

राकेश वर्मा, बेरमो : सीसीएल प्रबंधन की अदूरदर्शिता व नीतिगत बदलावों की मार हमेशा निम्न श्रेणी को झेलनी पड़ती है. आवाज उठानेवाले लुंजपुंज हों तो यह मार दोहरी हो जाती है. बेरमो कोयलांचल अंतर्गत सीसीएल के कथारा, ढोरी एवं बीएंडके एरिया की करीब आधा दर्जन परियोजनाओं में लोकल सेल की बंदी इसका ज्वलंत उदाहरण है. […]

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राकेश वर्मा, बेरमो : सीसीएल प्रबंधन की अदूरदर्शिता व नीतिगत बदलावों की मार हमेशा निम्न श्रेणी को झेलनी पड़ती है. आवाज उठानेवाले लुंजपुंज हों तो यह मार दोहरी हो जाती है. बेरमो कोयलांचल अंतर्गत सीसीएल के कथारा, ढोरी एवं बीएंडके एरिया की करीब आधा दर्जन परियोजनाओं में लोकल सेल की बंदी इसका ज्वलंत उदाहरण है.
प्रबंधकीय अगंभीरता और संवेदनहीनता की मार हजारों लोग गत पांच माह से झेल रहे हैं. इस स्थिति से लगभग 20 हजार लोडिंग मजदूरों के समक्ष रोजी-रोटी का विकट संकट उत्पन्न हो गया है. इनकी जमीन पर स्थित खदानों से देश में उजाला देनेवाले पावर प्लांटों को तो कोयला मिलता है, पर इन्हें भुखमरी से दो-चार होना पड़ रहा है.
दंगल के दंगल के सामने रोजी-रोटी का सवाल
विदित हो कि सीसीएल के कथारा, ढोरी एवं बीएंडके एरिया की एक-एक कोलियरी के लोकल सेल में मजदूरों का 40-50 दंगल लोडिंग करता है. एक दंगल में 10-15 मजदूर रहते हैं. इस गणित से हजारों मजदूर काम से बैठे हुए हैं. दशहरा, दीपावली व अब छठ पर्व भी इनका फीका-फीका रहा. इसके अलावा ट्रक ऑनर, चालक व उप चालक के समक्ष भी काफी परेशानी है.
बेरमो के लोकल सेल में चार हजार से ज्यादा ट्रक चलते हैं. कई ट्रकों की किश्त हर माह 60-70 हजार रु है. ऐसे में ट्रक मालिकों के लिए किश्त भरना मुश्किल हो रहा है. सैकड़ों चालक व उपचालक बेकार हो गये हैं. डीओ धारक अलग परेशान हैं. विस्थापित ग्रामीणों के अलावा कोयले के लोकल सेल से प्रत्यक्ष व अप्रत्यक्ष रुप से जुडे हजारों लोगों के समक्ष रोजी-रोटी की समस्या आ खड़ी हुई है.
ऐसे में जिनकी जमीन पर माइंस स्थित हैं वे ही दाने-दाने को मोहताज हैं. प्राय: सभी माइंस विस्थापितों की जमीन पर हैं. इनके पूर्वजों ने कोयला खनन के लिए सीसीएल प्रबंधन को अपनी जमीन दी. उन्हें अभी भी कई कोलियरियों में अपने हक की लड़ाई लड़नी पर रही है. ऐसे सैकड़ों ट्रक ऑनर हैं जिन्होंने अपने सेवानिवृत्त पिता की कमाई से ट्रक लिया, अब पांच माह से ट्रक की किश्त फेल हो रही है.
पांच माह से ब‍ंद हैं परियोजनाओं के लोकल सेल, हजारों लोग प्रभावित, बीएंडके व ढोरी में हो चुका है प्रदर्शन
प्रबंधन का ध्यान सिर्फ रैक पर
पावर प्लांटों में कोल शॉर्टेज के मद्देनजर कोयला मंत्रालय के सख्त निर्देश के कारण प्रबंधन का ध्यान डिस्पैच के लिए फिलहाल रेलवे रैक पर है. विभिन्न राज्यों के पावर व सीमेंट प्लांटों में पहले कोयला भेजा जा रहा है. करीब 70-80 फीसदी कोयला रेल से डिस्पैच हो रहा है. इसके बाद बचे कोयले को माइंस की 60 किमी परिधि में स्थित प्लांटों को सड़क मार्ग से डिस्पैच किया जा रहा है.
पावर प्लांट में कोयले की पर्याप्त मात्रा में आपूर्ति के मद्देनजर स्टॉक और डिस्पैच को लेकर डे-टू-डे मंत्रालय मॉनीटरिंग हो रही है. इसके लिए मंत्रालय ने सभी अानुषंगिक कंपनियों में एक-एक चीफ नोडल ऑफिसर (सीएनओ) नियुक्त किये हैं. एक नवंबर से मंत्रालय रोजाना प्रोडक्शन की अपडेट रिपोर्ट ले रहा है.
वार्ता और आश्वासन के बीच झूलता रहा आंदोलन
इधर, परियोजना के लोकल सेल की बंदी या फिर कोयले का ऑफर भेजने में उदासीनता दिख रही है. नतीजतन क्षेत्र में मजदूरों व सेल से संबद्ध लोगों का आक्रोश गहराता जा रहा है. गत दो नवंबर को बीएंडके एरिया की एकेके व कारो परियोजना से जुड़े हजारों लोगों ने करगली गांधी चौक के निकट सभा व प्रदर्शन किया था. 14 नवंबर को भी कारो और एकके परियोजना में एक माह से बंद लोकल खोलने को ले बीएंडके जीएम के साथ हुई वार्ता विफल रही. मौके पर सेल का ऑफर नहीं देने पर आगामी 16 नव‍ंबर से बेमियादी चक्का जाम आंदोलन की चेतावनी दी थी.
क्या रैक को देख कर मजदूरों का पेट भरेगा : पांडेय
गत पांच नव‍ंबर को डुमरी विधायक जगरनाथ महतो ने भी ढोरी जीएम कार्यालय के समक्ष प्रदर्शन व सभा में मजदूरों का साथ दिया. एरिया ठप कर देने की चेतावनी भी दी गयी. स्वांग व गोविंदपुर परियोजना के लोकल सेल से जुडे लोगों ने भी प्रबंधन को चेतावनी दी है. सांसद रवींद्र कुमार पांडेय का भी कहना है कि जब सारा कोयला रैक से ही जायेगा तो क्या लोकल सेल के हजारों मजदूर रेलवे के डिब्बे को देख कर पेट भरेंगे.
” मंत्रालय के सख्त निर्देश से स्थिति उत्पन्न हुई ”
सीसीएल के तीनों एरिया प्रबंधन का कहना है कि हर माह पहले की तरह ही लोकल सेल के लिए कोयले का ऑफर भेजा जा रहा है, पर मुख्यालय से ही फिलहाल ऑफर बंद है. पहले भी जितना ऑफर भेजा जाता था उसमें से मात्र 10-20 फीसदी ही ऑफर में दिया जाता था. देश के पावर प्लांटों में रेलवे रैक से अधिकांश कोयला डिस्पैच के मंत्रालय के सख्त निर्देश के कारण यह स्थिति उत्पन्न हुई है.
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