हौसले से मिली दृष्टि बाधित निशांत को कामयाबी

Updated at : 25 Jun 2014 10:18 AM (IST)
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हौसले से मिली दृष्टि बाधित निशांत को कामयाबी

जमशेदपुर: 10वीं तक रंग बिरंगी दुनिया देखने वाले निशांत के जीवन में ऐसा सैलाब आया कि उसे अपनी आंखें गंवानी पड़ी. मेधावी व जीवन में कुछ अलग कर गुजरने की सपने देखने वाला निशांत के आगे पहाड़ टूट गया. लेकिन अपनी कड़ी मेहनत व सच्चे लगन की बदौलत वह आज टाटा स्टील के आइएल छह […]

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जमशेदपुर: 10वीं तक रंग बिरंगी दुनिया देखने वाले निशांत के जीवन में ऐसा सैलाब आया कि उसे अपनी आंखें गंवानी पड़ी. मेधावी व जीवन में कुछ अलग कर गुजरने की सपने देखने वाला निशांत के आगे पहाड़ टूट गया. लेकिन अपनी कड़ी मेहनत व सच्चे लगन की बदौलत वह आज टाटा स्टील के आइएल छह स्तर का अधिकारी बन गया है. इसे कोरी कल्पना कहा जाये तो कोई दो राय नहीं होगी, लेकिन यह हकीकत है.

कदमा ओल्ड टीसी कॉलोनी निवासी निशांत सिंह ने ऐसा कर दिखाया. टाटा स्टील के कर्मचारी सुशील कुमार सिंह और शिक्षिका सुशीला देवी ने भी अपने बेटे निशांत के लिए कई ख्वाब देखे थे. दोनों बेटियों की तरह उनका बेटा भी पढ़ाई में अव्वल था. राजेंद्र विद्यालय से उसने 2000 में 10वीं पास करने के बाद उच्च शिक्षा की तैयारी शुरू की. इस दौरान अचानक उसके दाहिने आंख की रोशनी चली गयी. शंकर नेत्रालय में चिकित्सकों ने उनका ऑपरेशन किया, लेकिन स्थिति और बिगड़ गयी.

ऑपरेशन सफल नहीं रहा. बाद में वे कटक स्थित डॉ सनातन रथ के पास गये. वहां से उनको डॉ बीके मिश्र के पास भेजा गया. डॉ मिश्र ने बताया कि गलत तरीके से इलाज होने के कारण ऐसी स्थिति हुई है. उसकी आंखों में टय़ूमर हो गया था, जिसे तत्काल निकाल देना चाहिए था. फिर भी डॉ मिश्र ने ऑपरेशन किया. टय़ूमर कैंसर का रूप ले रहा था. ऑपरेशन सफल रहा, लेकिन उसकी आंखों की रोशनी चली गयी. हंसते-खेलते परिवार पर दुख का पहाड़ टूट पड़ा. निशांत को लगा कि अब उसकी जिंदगी अंधकारमय हो चुकी है.

इस दौरान उसकी मुलाकात नेशनल एसोसिएशन फॉर ब्लाइंड के अतुल रंजन सहाय से हुई, उन्होंने उनका हौसला बढ़ाया. निशांत ने नेशनल ओपन स्कूल के डीबीएमएस कैरियर एकेडमी से पढ़ाई की और बारहवीं में उत्तीर्ण हुए. निशांत ने पढ़ाई की और उसकी छोटी बहन ने राइटिंग की. उसको अच्छे अंक हासिल हुए. निशांत की मां ने उसे पढ़ने में हर संभव मदद की. वह बीबीए की डिग्री लेने के लिए पुडुचेरी चला गया. वहां बीबीए की डिग्री हासिल की. बाद में जैट (एक्सएटी) की परीक्षा दी. यहां उनको 88.4 फीसदी अंक हासिल हुआ.

उनको रांची स्थित एक्सआइएसएस में दाखिला मिल गया. एक्सआइएसएस में कैंपस सेलेक्शन हुआ, लेकिन उसने भाग नहीं लिया क्योंकि वहां स्थानीय स्तर पर नौकरी नहीं मिल रही थी. अंत में टाटा स्टील ने ब्रेक दिया. आज वे आइटीएस विभाग में बतौर आइएल 6 स्तर के अधिकारी (असिस्टेंट मैनेजर) हैं. निशांत ने नौकरी करने के बाद अब शादी भी कर ली है. निशांत की पत्नी विनिता सिंह भी एमबीए की डिग्री हासिल कर चुकी है. वह हाउस वाइफ है. निशांत का कहना है कि अगर मां नहीं होती तो पढ़ाई नहीं की होती. पिता और मां की मेहनत का फल मुङो मिला. टाटा स्टील का भरपूर सहयोग मिला. अतुल रंजन सहाय, मित्रों व साथ में काम करने वालों के सहयोग से यह सब संभव हो सका. निशांत ने बताया कि उनकी पत्नी भी उनका सहयोगी बन चुकी है तो नयी ताकत मिली है. उन्होंने कहा कि कभी भी कुछ भी परेशानी हो, तो उससे हारना नहीं चाहिए. उसका सामना करना चाहिए. यहीं मुङो जिंदगी ने सिखाया है.

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