मूलवासी की पहचान बने 1932 का खतियान

Updated at : 10 Jun 2014 3:02 AM (IST)
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मूलवासी की पहचान बने 1932 का खतियान

जमशेदपुर: 1932 का सर्वे सेटलमेंट खतियान वाले ही झारखंडी माने जायेंगे. झारखंड का गठन आदिवासी-मूलवासी को केंद्र बिंदु मान कर किया गया है. इसलिए आदिवासी-मूलवासी ही झारखंडी है. उक्त निष्कर्ष बिरसा मुंडा के 114 वीं शहादत दिवस पर कदमा उलियान स्थित शहीद निर्मल महतो सामुदायिक भवन में झारखंड आंदोलनकारियों एवं बुद्धिजीवियों द्वारा आयोजित झारखंडी डोमिसाइल […]

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जमशेदपुर: 1932 का सर्वे सेटलमेंट खतियान वाले ही झारखंडी माने जायेंगे. झारखंड का गठन आदिवासी-मूलवासी को केंद्र बिंदु मान कर किया गया है. इसलिए आदिवासी-मूलवासी ही झारखंडी है. उक्त निष्कर्ष बिरसा मुंडा के 114 वीं शहादत दिवस पर कदमा उलियान स्थित शहीद निर्मल महतो सामुदायिक भवन में झारखंड आंदोलनकारियों एवं बुद्धिजीवियों द्वारा आयोजित झारखंडी डोमिसाइल चिंतन-मंथन शिविर में निकला.

शिविर में झारखंड किसके लिए ? झारखंडी कौन और डोमिसाइल क्यों पर मंथन किया गया. शिविर में वक्ताओं ने सरकार द्वारा डोमिसाइल नीति निर्धारण कमेटी की सिफारिश-राज्य गठन के 15 वर्ष (यानी 1985) से पहले रहने वाले को झारखंडी और खतियान धारी को मूलवासी होने के प्रस्ताव को एकसिरे से खारिज कर दिया. शिविर में कुल 9 प्रस्ताव पारित किये गये. जिसे झारखंड बुद्धिजीवियों का एक प्रतिनिधिमंडल राज्य सरकार को शीघ्र सौंपेगा.

झारखंडी मुद्दे पर वक्ताओं के तर्क
वक्ताओं ने तर्क दिया है कि डोमिसाइल नीति पर सुप्रीम कोर्ट का जजमेंट 9 जनवरी 2002 को हुआ है. जिसका नंबर 1998 का सीए 5834 है. जिसमें सुप्रीम कोर्ट के न्याय मूर्ति बीएन खरे और न्याय मूर्ति बीएन अग्रवाल की खंडपीठ ने व्यवस्था दी है कि कोई भी भारतीय नागरिक किसी एक राज्य का ही मूल निवासी हो सकता है. जहां उनके पूर्वज पीढ़ी दर पीढ़ी से निवास करते आये हैं. यानी एक नागरिक दो राज्यों के मूल निवासी नहीं हो सकते हैं. आरक्षण के मामले में भी पटना हाइकोर्ट ने भी वर्ष 2009 में एक याचिका की सुनवाई करते हुए व्यवस्था दी है कि प्रदेश की नौकरियों में बाहरी लोगों को आरक्षण का लाभ नहीं मिलेगा. इस संदर्भ में उच्च न्यायालय ने उत्तर प्रदेश के मूल निवासी के दो न्यायिक अधिकारियों की नियुक्ति रद्द कर दी थी.

2009 में सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि अपना मूल राज्य छोड़ कर अन्य राज्य में जा बसे लोग अपनी जाति के आधार पर संबंधित राज्य में प्रवासी आरक्षण का लाभ पाने का दावा नहीं कर सकते हैं. संविधान की अनुच्छेद 371(डी) में प्रावधान आंध्र प्रदेश राज्य के तर्ज पर 1932 के सर्वसेटलमेंट के खतियान के आधार पर झारखंड में डोमिसाइल नीति (स्थानीयता) निर्धारित होनी चाहिए.

ये प्रस्ताव भी पास हुए

मंडल कमीशन की सिफारिश के तहत ओबीसी को 27 प्रतिशत साथ ही झारखंडियों को 90 प्रतिशत रोजगार में अवसर प्रदान किया जाये

हमारे गांव में हमारा ही राज हो

पारित किये गये 9 प्रस्ताव

संपूर्ण झारखंड के लिए उलगुलान किया जायेगा

आदिवासी-मूलवासी ही झारखंडी हैं

1932 का खतियान ही मूलवासी की पहचान होगा

सीएनटी व एसपीटी एक्ट को सख्ती से लागू किया जाय

कानूनों के उल्लंघन की जांच के लिए अलग आयोग का गठन किया जाये

छोटानागपुर व संतालपरगना को स्वायत्तता का अधिकार प्रदान किया जाये

झारखंडी मातृभाषा को प्राथमिक शिक्षा में अनिवार्य किया जाये

किसने क्या कहा

बागुन सुम्बरूई
सभी राज्यों का अपना डोमिसाइल है. झारखंड का भी अपना डोमिसाइल होना चाहिए. एक आदमी का एक ही वोटर कार्ड होना चाहिए. एक नागरिक दो राज्यों के मूल निवासी नहीं हो सकते हैं. इसलिए जो जहां का मूल निवासी होगा, वहीं उसे आरक्षण का लाभ मिलना चाहिए. यहां-वहां दोहरी नीति नहीं चलेगी. इसलिए 1932 के खतियान को झारखंडी होने का आधार वर्ष माना जाना चाहिए.

डॉ. बीपी केशरी

आदिवासी-मूलवासी ही झारखंडी हैं. वहीं यहां राज करेंगे. कोई भी यहां आकर रोजी-रोजगार कर सकता है. झारखंडियों के हक को मारने वाले को बरदाश्त नहीं किया जायेगा. इसके लिए नये उलगुलान की शुरूआत की जायेगी.

बहादुर उरांव

राज्य का गठन आदिवासी-मूलवासी के लिए हुआ. इसलिए यहां हक अधिकार पर उनका दावा बनता है. आदिवासी-मूलवासी ही झारखंडी हैं. फिर भी दरकिनार करने की साजिश चल रही है. इसे किसी भी कीमत पर बरदाश्त नहीं किया जायेगा.

देवेंद्र नाथ चांपिया

हर राज्य का अपना-अपना डोमिसाइल है. लेकिन राज्य गठन के 14 साल बाद भी झारखंड का अपना डोमिसाइल नहीं बना सका है. इसका मुख्य कारण यहां बाहरी आबादी का बढ़ना है. स्थानीयता का आधार 1932 के खतियान को बनाया जाना चाहिए.

सूर्यसिंह बेसरा

झारखंड में रहने वाले सभी को झारखंडी कहना बिल्कुल गलत है. भाषा-संस्कृति किसी भी समुदाय विशेष के जातीयता की पहचान बनती है. इसलिए भाषा-संस्कृति व पारंपरिक व्यवस्था के साथ 1932 के खतियान को आधार बनाया जाना चाहिए.

संजय बसु मल्लिक

लाभ लेने के लिए झारखंडी होने का दावा करना कहीं से उचित नहीं है. झारखंड राज्य का सृजन आदिवासी-मूलवासी के लिए ही हुआ है. एक व्यक्ति एक ही राज्य का मूल निवासी हो सकता है.

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