80 घरों की चक इब्राहिम बस्ती में किसी के पास शौचालय नहीं
Updated at : 14 Dec 2015 2:57 AM (IST)
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बिदुपुर : महादलितों के उत्थान और समाज की मुख्य धारा में लाने का वर्तमान सरकार जितना भी ढिढ़ोरा पीट ले, लेकिन बिदुपुर प्रखंड स्थित अमेर पंचायत के चक इब्राहिम गांव में यह दावा खोखला साबित हो रहा है. सदियों से समाज से उपेक्षित कूड़ा-करकट, चूहा-घोंघा चुन कर खाने वाले इन महादलितों के गांव में गरीबी,अभाव […]
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बिदुपुर : महादलितों के उत्थान और समाज की मुख्य धारा में लाने का वर्तमान सरकार जितना भी ढिढ़ोरा पीट ले, लेकिन बिदुपुर प्रखंड स्थित अमेर पंचायत के चक इब्राहिम गांव में यह दावा खोखला साबित हो रहा है. सदियों से समाज से उपेक्षित कूड़ा-करकट, चूहा-घोंघा चुन कर खाने वाले इन महादलितों के गांव में गरीबी,अभाव और कष्ट का आलम रहा है. लेकिन दूसरे लोगों की चमक -दमक से इनके मन में भी लालसा जगी है कि इनके भी बच्चे पढ़े-लिखे और शिक्षित बनें.
आजादी के 69 साल बीतने के बाद भी बिदुपुर प्रखंड के चक इब्राहिम गांव की महादलित बरती में अब तक शिक्षा की रोशनी नहीं पनपी. इस बस्ती में एक भी व्यक्ति मैट्रिक पास नहीं है. अधिकतर लोग निरक्षर हैं. मजदूरी के सहारे अपना पेट पालते हैं.
पक्का मकान तो बना, लेकिन शौचालय नहीं : पंचायती राज व्यवस्था में इंदिरा आवास योजना के तहत लगभग दो दर्जन महादलितों के पक्के मकान अवश्य बने, लेकिन इनमें खिड़की और दरवाजे अब तक नहीं लग पाये हैं. वहीं संपूर्ण स्वच्छता और घर- घर शौचालय की सुविधा उपलब्ध कराने के अभियान पर करोड़ों-अरबों रुपये खर्च किये जाने के बावजूद इस बस्ती में किसी के पास शौचालय नहीं है.
शिक्षा की मुकम्मल व्यवस्था नहीं : प्रखंड मुख्यालय के सटे दो किलोमीटर की दूरी पर यह गांव स्थित है, जिसमें छोटे बच्चों के पढ़ने के लिए एक आंगनबाड़ी केंद्र और एक नवसृजित प्राथमिक विद्यालय है. इन विद्यालयों में बच्चों को क से कलम और अ से अनार पढ़ने की शुरुआत तो हुई, लेकिन इनमें से कोई भी बच्चे उच्च शिक्षा अब तक प्राप्त नहीं कर पाये. लिलकु मांझी, रामचंद्र मांझी, भभीखन मांझी एवं रेणुका देवी के अलावा यहां ककहरा भी कोई नहीं जानता है.
एक मात्र बहू रेणुका है आठवीं पास : इस बस्ती में दीपन मांझी की पतोहू रेणुका एक मात्र महिला है, जो आठवीं पास है. जिसके बारे में इस गांव के लोग गर्व से कहते है कि बहुरिया पढ़ी-लिखी है. गांव के मुखिया तिलकेश्वर मांझी, जोधन मांझी, राजींद्र मांझी आदि के मन में शिक्षा के प्रति जिज्ञासा प्रबल हो रही है. लेकिन सुविधाओं के अभाव में फटेहाल इन गरीबों की बस्ती में शिक्षा की रोशनी कब तक पनपेगी, यह तो वक्त ही बतायेगा.
क्या कहते हैं लोग
आजादी के 69 वर्ष बीतने के बावजूद अब तक उच्च शिक्षा की रोशनी नहीं पहुंची. इस बस्ती में एक भी मैट्रिक पास नहीं है. विकास से कोसों दूर है, लेकिन दूसरे के बच्चों को देख कर बस्ती के लोगों के मन में जिज्ञासा प्रबल हो रही है कि मेरे भी बच्चे पढ़े-लिखें और देश का नाम रोशन करें.
तिलकेश्वर मांझी,उपमुखिया
महादलित बस्ती के उत्थान के लिए तीन वर्ष पहले आयुक्त एसके नेगी आये थे. लेकिन सुविधाओं के अभाव में फटेहाल यह बस्ती जस-की-तस रह गयी. यहां के अधिकतर लोग चूहा, धोंधा चुन कर एवं मजदूरी कर अपना जीवन बसर कर रहे हैं, लेकिन उच्च शिक्षा की रोशनी अब तक नहीं पनपी.
उदय प्रकाश यादव, राजद अध्यक्ष
क्या कहते हैं बीडीओ
गांव के प्रत्येक व्यक्ति को साक्षर करने का हर संभव प्रयास किया जा रहा है. जल्द ही यहां की व्यवस्था सुधरेगी. महादलित बस्ती में पक्कीकरण होगा. इसके लिए योजना पर काम शुरू कर दिया गया है. शीघ्र ही अच्छा परिणाम सामने आयेगा.
दुनिया लाल यादव, बीडीओ
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