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जिले में प्लास्टिक का विकल्प बन सकता है बनाना फाइबर

Updated at : 24 Dec 2019 6:32 AM (IST)
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जिले में प्लास्टिक का विकल्प बन सकता है बनाना फाइबर

हाजीपुर : प्लास्टिक के उपयोग व इसके कचरे के दुष्प्रभाव से पूरी दुनिया भलीभांति वाकिफ है. प्लास्टिक के कचरे के निस्तारण व प्लास्टिक की वैकल्पिक व्यवस्था के लिए कई स्तरों पर प्रयास किये जा रहे हैं. ऐसे केले के रेशे से बने उत्पाद न सिर्फ प्लास्टिक व पॉलीथिन का बेहतर विकल्प बन सकते हैं, बल्कि […]

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हाजीपुर : प्लास्टिक के उपयोग व इसके कचरे के दुष्प्रभाव से पूरी दुनिया भलीभांति वाकिफ है. प्लास्टिक के कचरे के निस्तारण व प्लास्टिक की वैकल्पिक व्यवस्था के लिए कई स्तरों पर प्रयास किये जा रहे हैं. ऐसे केले के रेशे से बने उत्पाद न सिर्फ प्लास्टिक व पॉलीथिन का बेहतर विकल्प बन सकते हैं, बल्कि इनका पर्यावरण पर कोई दुष्प्रभाव भी नहीं पड़ता है.

इसी सोच के साथ बिदुपुर प्रखंड के खिलवत गांव में केले के रेशे से इन दिनों डिस्पोजेबल थाली-प्लेट के साथ-साथ टोपी, हैंड बैग, चप्पल, कागज आदि का निर्माण किया जा रहा है. केले के रेशे से बनने वाले पेपर का इस्तेमाल कवर फाइल, ठोंगा आदि के निर्माण के लिए किया जा सकता है. हालांकि बाजार के अभाव व इसकी कीमत थोड़ी अधिक रहने की वजह से इसकी मांग जोर नहीं पकड़ पा रही है.
बीते रविवार को सहदेई बुजुर्ग में अंधरावड़ चौके समीप स्थित सेंटर ऑफ एक्सीलेंस फॉर फ्रूट्स के उद्घाटन के सिलसिले में पहुंचे मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने कैंपस में लगायी गयी इसकी प्रदर्शनी का निरीक्षण किया था. साथ ही पदाधिकारियों से कहा था कि इसे और कैसे आगे बढ़ाया जाये, इस पर कार्य करें.
मुख्यमंत्री को भा गयी थी टोपी
मालूम हो कि फरवरी 2017 में बिदुपुर प्रखंड की बिदुपुर पंचायत के वार्ड नंबर दो में सात निश्चय योजना के समीक्षा व शुभारंभ करने पहुंचे मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने केले के थंब के रेशे से तैयार किये जाने वाले संयंत्र का निरीक्षण किया था. वहां उन्हें केले के थंब के रेशे से बनी टोपी काफी भा गयी थी. केसरिया, सफेद व हरे रंग से बनी इस टोपी में सामने की ओर अशोक चक्र बना हुआ था. मुख्यमंत्री को यह टोपी इतनी भा गयी थी कि उन्होंने इसे अपने सिर पर पहन लिया था.
कीमत कम करने का किया जा रहा प्रयास
इस उद्योग से जुड़े खिलवत के नीतीश बताते हैं कि वर्ष 2011 में उसने पीएमइजीपी योजना से पांच लाख रुपये लोन लेकर यह उद्योग शुरू किया था. केला अनुसंधान केंद्र त्रिची व कृषि अनुसंधान केंद्र, हरिहरपुर, हाजीपुर से उसने इसकी ट्रेनिंग ली थी. अभी विद्युत विभाग से एक-एक हजार डिस्पोजेबल थाली व प्लेट की डिमांड है. जीविका से भी इसकी सप्लाइ की बात चल रही है. वे बताते हैं कि अभी लोगों को इसकी कीमत थोड़ी ज्यादा लग रही है, लेकिन ऐसा नहीं है. कीमत कम करने का प्रयास किया जा रहा है.
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