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सवा रुपये की शादी, शगुन में किताबें

Updated at : 08 Feb 2026 7:23 PM (IST)
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सवा रुपये की शादी, शगुन में किताबें

प्राची का निजी जीवन सादगी व मूल्यों की है मिसाल

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-सुपौल की बेटी, सपनों की उड़ान: साधारण व्यापार करने वाले पिता की दृढ़ इच्छाशक्ति ने रचा इतिहास – बैंगलुरू स्थित जगदीश सेठ स्कूल ऑफ मैनेजमेंट में प्राध्यापक के रूप में कार्यरत हैं प्राची -पति हैं सीनियर डेटा इंजीनियर राजीव कुमार झा, सुपौल कभी-कभी इतिहास बड़े शहरों या आलीशान घरों में नहीं, बल्कि संघर्षों से भरी तंग गलियों और सीमित साधनों में लिखा जाता है. सुपौल जिले की यह कहानी भी कुछ ऐसी ही है, जहां एक साधारण व्यापार करने वाले पिता ने समाज की रूढ़ियों को चुनौती दी और अपनी बेटी की शिक्षा को ही अपनी सबसे बड़ी पूंजी बनायी. पिता ने बेटी की शादी सवा रुपये में की. कारण लड़की के होने वाले ससुर कुमोद झा ने कहा कि हमें दहेज नहीं मात्र सबा रुपये चाहिए. इतना ही नहीं कुमोद झा ने भार (संदेश) में किताब देकर पुत्रवधू का सम्मान किया. आपको सुनने में यह बात कुछ अटपटा लेगा, लेकिन यह हकीकत है. यह बात सामने आती भी नहीं, यदि प्रभात खबर ने इसकी खोज-खबर नहीं ली होती. पिछले लगन में ही शादी हुई, लेकिन किसी को यह बात सत्य लगा ही नहीं. सबने सोचा कि जब लड़का और लड़की दोनों पैसे के मामले में ठीक-ठाक हैं, तो दहेज न सही उपहार के रूप में भारी-भरकम सामान तो मिलेगा ही. लड़की के ससुर को किताब से इतना प्रेम था कि उन्होंने अपनी पुत्रवधू को शादी के उपहार में केवल किताबें ही दीं. पिता के विश्वास, त्याग और अटूट संघर्ष का परिणाम है कि आज प्राची ठाकुर आईआईटी रुड़की से पीएचडी कर चुकी हैं और एक ग्लोबल स्ट्रेटेजिस्ट के रूप में देश का नाम अंतरराष्ट्रीय मंचों पर रोशन कर रही हैं. जिला मुख्यालय स्थित मेला रोड निवासी श्याम ठाकुर का जीवन संघर्षों से भरा रहा. सीमित आमदनी और परिवार की जिम्मेदारियां इन सबके बावजूद उन्होंने कभी भी अपनी बेटी की पढ़ाई को बोझ नहीं समझा. समाज जब दहेज जोड़ने की सलाह देता था, तब वे किताबें खरीदते थे. जब लोग कहते थे, “लड़की को इतना पढ़ाकर क्या करोगे?” तो उनका जवाब होता था “पढ़ाई ही सबसे बड़ी ताकत है.” प्राची का निजी जीवन सादगी व मूल्यों की है मिसाल प्राची का निजी जीवन भी सादगी और मूल्यों की मिसाल है. उन्होंने बताया कि उनकी शादी 20 अप्रैल 2025 को सदर प्रखंड के बरूआरी गांव में नंद कुमार झा के साथ मात्र सवा रुपये में हुई थी. दहेज की जगह ससुराल वालों ने शगुन में पांच किताबें भेंट की. यह केवल एक विवाह नहीं, बल्कि उस विचारधारा का प्रतीक था जिसमें शिक्षा और ज्ञान को सबसे बड़ा आशीर्वाद माना गया. उनके पति सीनियर डेटा इंजीनियर हैं और दोनों समानता, सम्मान और सादगी के मूल्यों के साथ जीवन जी रहे हैं. प्राध्यापक के रूप में कार्यरत हैं प्राची प्राची ठाकुर बताती हैं कि उनके माता-पिता ने उन्हें जीवन का एक ही मूलमंत्र सिखाया “अच्छा कपड़ा और अच्छा खाना जिंदगी की सफलता तय नहीं करता, असली सफलता शिक्षा और सोच से आती है.” उन्होंने प्रभात खबर से बातचीत में कहा कि आर्थिक स्थिति भले ही मजबूत नहीं थी, लेकिन पढ़ाई के मामले में कभी कोई समझौता नहीं किया गया. प्राची की शैक्षणिक यात्रा आसान नहीं थी. आर्थिक तंगी, संसाधनों की कमी और सामाजिक दबाव हर कदम पर चुनौती बनकर सामने आए. प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी, शोध कार्य की लंबी रातें और कई बार असफलताओं का सामना इन सबके बीच पिता का अडिग विश्वास उनकी सबसे बड़ी ढाल बना. उन्होंने हर बार हार मानने के बजाय खुद को और मजबूत किया. आईआईटी रुड़की से पीएचडी की उपाधि प्राप्त करना केवल एक शैक्षणिक उपलब्धि नहीं थी, बल्कि उस सोच की जीत थी जो बेटियों को बराबरी का अधिकार देती है. पीएचडी पूरी करने के बाद प्राची की पहली पोस्टिंग मलेशिया में हुई, जहां उन्होंने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर रणनीतिक कार्यों में अपनी भूमिका निभायी. इसके बाद 01 जनवरी 2026 से वे बैंगलुरू स्थित जगदीश सेठ स्कूल ऑफ मैनेजमेंट में प्राध्यापक के रूप में कार्यरत हैं. वर्तमान में वे एक ग्लोबल स्ट्रेटेजिस्ट के रूप में विभिन्न देशों और संस्थानों के साथ काम कर रही हैं. आज प्राची ठाकुर की सफलता उन लाखों बेटियों के लिए उम्मीद की किरण है, जो सीमित संसाधनों के बावजूद बड़े सपने देखती हैं. यह कहानी सिर्फ एक बेटी की नहीं, बल्कि उस पिता की भी है जिसने समाज के तय पैमाने को ठुकरा कर भविष्य में निवेश किया.

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RAJEEV KUMAR JHA

लेखक के बारे में

By RAJEEV KUMAR JHA

RAJEEV KUMAR JHA is a contributor at Prabhat Khabar.

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