श्रद्धा व भक्ति से गूंजा पूरा क्षेत्र

आचार्य कृष्णानंद जी शास्त्री ने देवी महिमा का किया विस्तृत वर्णन
– मां दुर्गा मंदिर परिसर में उमड़ा श्रद्धालुओं का सैलाब – आचार्य कृष्णानंद जी शास्त्री ने देवी महिमा का किया विस्तृत वर्णन सुपौल. सदर प्रखंड अंतर्गत बरुआरी पश्चिम स्थित मां दुर्गा, दस महाविद्या, नवग्रह एवं श्रीकृष्ण मंदिर परिसर में आयोजित भव्य शतचंडी महायज्ञ को लेकर पूरे क्षेत्र में आस्था, श्रद्धा और भक्ति का अनुपम दृश्य देखने को मिल रहा है. यज्ञ के आयोजन से मंदिर परिसर और आसपास का इलाका पूरी तरह भक्तिमय वातावरण में डूब गया है. मंत्रोच्चारण की दिव्य ध्वनि, हवन कुंड से उठती पवित्र सुगंध और जय माता दी के जयघोष से संपूर्ण क्षेत्र गुंजायमान हो उठा है. शतचंडी महायज्ञ के दौरान सुबह से लेकर देर शाम तक श्रद्धालुओं की निरंतर आवाजाही बनी हुई है. स्थानीय ग्रामीणों के साथ-साथ दूर-दराज के क्षेत्रों से भी बड़ी संख्या में श्रद्धालु माता के दर्शन और यज्ञ में सहभागिता के लिए पहुंच रहे है. महिलाओं, पुरुषों, बुजुर्गों और युवाओं की समान भागीदारी ने आयोजन को और भी भव्य स्वरूप प्रदान किया है. श्रद्धालु पूरे श्रद्धा भाव से यज्ञ मंडप की परिक्रमा कर माता से सुख-समृद्धि और कल्याण की कामना कर रहे हैं. विधि-विधान से हो रहा शतचंडी महायज्ञ का आयोजन यह भव्य शतचंडी महायज्ञ सुप्रसिद्ध पौराणिक कथावाचक आचार्य कृष्णानंद जी शास्त्री पौराणिक महाराज के निर्देशन में विधिवत रूप से संपन्न कराया जा रहा है. यज्ञ में वैदिक मंत्रों के साथ आहुतियां दी जा रही है. विद्वान आचार्यों द्वारा शास्त्रीय विधि-विधान से पूजा-पाठ, हवन और अनुष्ठान किए जा रहे हैं, जिससे पूरा वातावरण आध्यात्मिक ऊर्जा से परिपूर्ण हो गया है. देवी महिमा पर आधारित प्रवचन से भावविभोर हुए श्रद्धालु शतचंडी महायज्ञ के अवसर पर आयोजित कथा के दौरान आचार्य कृष्णानंद जी शास्त्री ने देवी महिमा का अत्यंत विस्तारपूर्वक वर्णन किया. उन्होंने वेदव्यास जी द्वारा राजा जनमेजय को सुनाई गई देवी की महिमा का उल्लेख करते हुए कहा कि देवी ही संपूर्ण सृष्टि की जननी हैं. एक-एक ब्रह्मांड में ब्रह्मा, विष्णु और महेश के साथ समस्त देवगण, ग्रह-नक्षत्र, सूर्य और चंद्रमा की रचना देवी द्वारा ही की गई है. चतुर्दश भुवन व ब्रह्मांड की संरचना का वर्णन कथा के दौरान आचार्य ने बताया कि एक ब्रह्मांड पचास करोड़ योजन लंबा और पचास करोड़ योजन चौड़ा होता है, जिसमें कुल चौदह भुवन होते हैं. मनुष्य जिस लोक में निवास करता है, उसे भूलोक कहा जाता है. भूलोक के ऊपर क्रमशः भुवः लोक, स्वः लोक, महः लोक, जनः लोक, तपः लोक और सत्य लोक स्थित हैं, जहां ब्रह्मा का वास माना गया है. ये सात लोक ऊपर के हैं. उन्होंने बताया कि भूलोक के नीचे अत्तल, वितल, सुतल, तलतल, महातल, रसातल और पाताल ये सात लोक स्थित हैं. इस प्रकार कुल चौदह लोकों को चतुर्दश भुवन कहा जाता है. इन्हीं चौदह भुवनों का समुच्चय ब्रह्मांड कहलाता है, जिसे संक्षेप में त्रैलोक्य भी कहा गया है, जिसमें स्वर्ग, पृथ्वी और पाताल तीनों लोक सम्मिलित है. साढ़े तीन करोड़ ब्रह्मांडों की रचना देवी ने की आचार्य कृष्णानंद जी शास्त्री ने अपने प्रवचन में कहा कि ऐसी साढ़े तीन करोड़ ब्रह्मांडों की रचना देवी चंडिका द्वारा की गई है. देवी का मणिद्वीप नामक एक स्वतंत्र लोक है, जिसका कभी भी विनाश नहीं होता. यह लोक सभी लोकों में सर्वोत्तम माना गया है और देवी का परम धाम है. पृथ्वी लोक है कर्मभूमि, यहीं से मिलती है मोक्ष की प्राप्ति आचार्य ने पृथ्वी लोक की महत्ता पर विशेष प्रकाश डालते हुए कहा कि सभी लोकों में पृथ्वी लोक श्रेष्ठ है, क्योंकि यह कर्मलोक और कर्मभूमि है. अन्य सभी लोक भोगलोक और भोगभूमि कहलाते हैं, जहां केवल पूर्व जन्मों के कर्मों का फल भोगा जाता है. पृथ्वी लोक की यह विशेषता है कि यहां का निवासी सत्कर्म करके सीधे देवी लोक अर्थात मणिद्वीप की प्राप्ति कर सकता है. कहा कि स्वर्ग लोक या अन्य लोकों के वासियों को यह सुविधा नहीं है. इसलिए मनुष्य जन्म अत्यंत दुर्लभ और सौभाग्यशाली है. इस धरती पर जो लोग सत्कर्म, शुभकर्म, यज्ञ, व्रत, जप, तप, पूजा-पाठ, दया, सेवा और जनहित के कार्य करते हैं, वे देवी के मणिद्वीप लोक के अधिकारी बन जाते है. देवताओं के लिए भी दुर्लभ है मणिद्वीप लोक आचार्य कृष्णानंद जी शास्त्री ने कहा कि मणिद्वीप वही वैकुंठ है, जिसकी प्राप्ति देवताओं के लिए भी दुर्लभ मानी गई है. लेकिन मृत्यु लोक अर्थात पृथ्वी पर जन्मा मनुष्य यदि अच्छे कर्म करता है, तो वह सहज ही उस लोक को प्राप्त कर सकता है, जो देवताओं के लिए भी दुर्लभ है. यही मनुष्य जीवन की सबसे बड़ी विशेषता और उद्देश्य है. अधर्म और पाप का मार्ग नरक की ओर ले जाता है आचार्य ने पाप कर्मों से दूर रहने की सीख देते हुए कहा कि जो मनुष्य अधर्म, अन्याय, पाप, अनीति, अत्याचार और दुराचार में लिप्त रहते हैं, वे घोर नरक यातनाओं के अधिकारी बनते है. धन हरण, जन हरण, स्त्री हरण, चोरी, बेईमानी, हिंसा, सुरापान, मांस भक्षण, व्यभिचार, नशा सेवन, माता-पिता और गुरु का अपमान, गो एवं ब्राह्मण का अपकार तथा अपने परिजनों के साथ दुर्व्यवहार जैसे कुकृत्य करने वाले लोग चौरासी लाख योनियों में भटकते हुए नारकीय दुख भोगते हैं. शुभ कर्म ही मानव जीवन का उद्देश्य आचार्य ने राजा जनमेजय के प्रसंग का उल्लेख करते हुए कहा कि मनुष्य को चाहिए कि वह सदैव शुभ कर्म करता रहे और कभी भी अशुभ कर्म न करें. मानव जीवन केवल शुभ कर्मों के लिए ही मिला है. जो व्यक्ति जीवन में धर्म, सत्य और सदाचार का पालन करता है, वही सच्चे अर्थों में मानव कहलाता है और वही देवी की कृपा का पात्र बनता है. शतचंडी महायज्ञ केवल धार्मिक अनुष्ठान ही नहीं, बल्कि सामाजिक और आध्यात्मिक चेतना का भी केंद्र बना हुआ है. इस आयोजन से क्षेत्र में सकारात्मक ऊर्जा, आपसी सद्भाव और धार्मिक संस्कारों का प्रसार हो रहा है. श्रद्धालुओं का कहना है कि इस प्रकार के आयोजन से नई पीढ़ी को अपनी संस्कृति, परंपरा और धर्म के प्रति जागरूकता मिलती है. आयोजन समिति ने बताया कि शतचंडी महायज्ञ के समापन तक प्रतिदिन पूजा-पाठ, हवन और कथा का आयोजन जारी रहेगा. बरुआरी पश्चिम क्षेत्र इस समय देवी भक्ति के रंग में रंगा हुआ है. जय माता दी के जयघोष से वातावरण निरंतर गूंज रहा है.
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