मौसम ने तोड़ी कमर, बाजार ने छीनी उम्मीद, 1800 रुपये क्विंटल मक्का बेचने को मजबूर किसान

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मौसम ने तोड़ी कमर, बाजार ने छीनी उम्मीद, 1800 रुपये क्विंटल मक्का बेचने को मजबूर किसान

1800 रुपये क्विंटल मक्का बेचने को मजबूर किसान

Supaul News: पहले तेज हवा और बारिश ने खेतों में मक्का की फसल गिरा दी, फिर बाजार में कीमतों ने किसानों को झटका दे दिया. कोसी क्षेत्र के किसान लागत निकालने के लिए भी संघर्ष कर रहे हैं.

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उमेश कुमार, जदिया (सुपौल).

Supaul News: कोसी क्षेत्र में मक्का किसानों की मुश्किलें इस बार दोहरी हो गई हैं. एक तरफ मौसम की मार ने खेतों में खड़ी फसल को भारी नुकसान पहुंचाया, तो दूसरी तरफ बाजार में उचित कीमत नहीं मिलने से किसान आर्थिक संकट में फंस गए हैं. जदिया और आसपास के इलाकों में किसान अपनी मक्का की उपज महज 1800 रुपये प्रति क्विंटल की दर से बेचने को मजबूर हैं. किसानों का कहना है कि मौजूदा कीमत पर खेती की लागत निकालना भी मुश्किल हो गया है.

आंधी-बारिश ने खेतों में बिछा दी फसल

इस वर्ष मक्का की फसल शुरुआत में बेहतर दिख रही थी और किसानों को अच्छी पैदावार की उम्मीद थी. लेकिन बाली निकलने के दौरान कई बार तेज हवा और बारिश ने खेतों में तबाही मचा दी. बड़ी संख्या में मक्का के पौधे जमीन पर गिर गए. इससे दानों का विकास प्रभावित हुआ और उत्पादन में भारी गिरावट दर्ज की गई.

किसानों के अनुसार जहां प्रति एकड़ 35 से 40 क्विंटल उत्पादन की उम्मीद थी, वहां कई खेतों में पैदावार घटकर 20 से 25 क्विंटल तक रह गई. उत्पादन में आई इस कमी ने किसानों की आर्थिक गणित बिगाड़ दी है.

बढ़ती लागत ने बढ़ाई चिंता

खेती की लागत लगातार बढ़ रही है. उन्नत बीज, खाद, कीटनाशक, सिंचाई और मजदूरी पर पहले की तुलना में अधिक खर्च करना पड़ रहा है. डीजल की बढ़ती कीमतों ने सिंचाई को और महंगा बना दिया है.

स्थानीय किसानों का कहना है कि एक एकड़ मक्का की खेती में 25 से 30 हजार रुपये तक खर्च हो जाता है. ऐसे में यदि उत्पादन कम हो जाए और बाजार में दाम भी न मिले, तो किसानों के लिए खेती घाटे का सौदा बन जाती है.

1800 रुपये क्विंटल के भाव से टूटी उम्मीद

फसल तैयार होने के बाद किसानों को उम्मीद थी कि कम उत्पादन के कारण बाजार में बेहतर कीमत मिलेगी. लेकिन स्थानीय मंडियों में मक्का का भाव 1800 रुपये प्रति क्विंटल के आसपास सिमट गया है.

किसानों का आरोप है कि सरकारी खरीद व्यवस्था प्रभावी नहीं होने से व्यापारी मनमाने दाम पर खरीदारी कर रहे हैं. भंडारण की पर्याप्त सुविधा नहीं होने के कारण किसान अपनी उपज रोक भी नहीं पा रहे और मजबूरी में कम कीमत पर बेच रहे हैं.

सरकार से राहत की मांग

क्षेत्र के किसानों ने सरकार से मक्का का लाभकारी समर्थन मूल्य तय करने, सरकारी खरीद केंद्र खोलने और मौसम से हुई फसल क्षति का सर्वे कर मुआवजा देने की मांग की है. उनका कहना है कि यदि यही स्थिति रही तो आने वाले वर्षों में किसान मक्का की खेती से दूरी बनाने लगेंगे.

कोसी क्षेत्र के किसानों की जुबान पर आज एक ही सवाल है कि आखिर मेहनत, मौसम और बाजार तीनों की मार झेलने के बाद किसान कैसे टिकेगा. खेतों से मंडी तक संघर्ष कर रहे किसानों की यह पीड़ा केवल आर्थिक संकट नहीं, बल्कि ग्रामीण कृषि व्यवस्था के सामने खड़ी बड़ी चुनौती की कहानी भी है.

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प्रत्युष प्रशांत

लेखक के बारे में

By प्रत्युष प्रशांत

महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय से पत्रकारिता में एम.ए. तथा जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (JNU) से मीडिया और जेंडर में एमफिल-पीएचडी के दौरान जेंडर संवेदनशीलता पर निरंतर लेखन. जेंडर विषयक लेखन के लिए लगातार तीन वर्षों तक लाडली मीडिया अवार्ड से सम्मानित रहे. The Credible History वेबसाइट और यूट्यूब चैनल के लिए कंटेंट राइटर और रिसर्चर के रूप में तीन वर्षों का अनुभव. वर्तमान में प्रभात खबर डिजिटल, बिहार में राजनीति और समसामयिक मुद्दों पर लेखन कर रहे हैं. किताबें पढ़ने, वायलिन बजाने और कला-साहित्य में गहरी रुचि रखते हैं तथा बिहार को सामाजिक, सांस्कृतिक और राजनीतिक दृष्टि से समझने में विशेष दिलचस्पी.

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