सावन की पहली सोमवारी से शुरू होगा मधुश्रावणी पर्व, 13 दिन तक नवविवाहिताएं करेंगी अखंड सौभाग्य की कामना

आचार्य धर्मेंद्र नाथ मिश्र | Prabhat Khabar Network
Madhushravani 2026: मिथिलांचल में 3 अगस्त से मधुश्रावणी का 13 दिवसीय पावन पर्व शुरू हो रहा है. यह नवविवाहिताओं के लिए पति की लंबी उम्र और सुखी दांपत्य जीवन की कामना का व्रत है. इस दौरान विशेष पूजा-अर्चना, कथा श्रवण और टेमी दागने जैसी अनोखी रस्में निभाई जाती हैं.
Madhushravani 2026 : सावन मास के आगमन के साथ ही मिथिला में लोकआस्था और परंपराओं से जुड़े पर्व-त्योहारों की शुरुआत हो गई है. इसी क्रम में नवविवाहिताओं के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण मधुश्रावणी पर्व 3 अगस्त, सोमवार से आरंभ होगा. यह पर्व लगातार 13 दिनों तक चलेगा और 15 अगस्त, शनिवार को टेमी दागने की पारंपरिक रस्म के साथ संपन्न होगा. इस वर्ष मधुश्रावणी की शुरुआत सावन की पहली सोमवारी से होने के कारण इसका धार्मिक और सांस्कृतिक महत्व और अधिक बढ़ गया है.
पति की लंबी उम्र और सुखी दांपत्य के लिए रखा जाता है व्रत
मधुश्रावणी मिथिला की सबसे प्राचीन और विशिष्ट सांस्कृतिक परंपराओं में शामिल है. इस पर्व में नवविवाहिताएं अपने पति की दीर्घायु, दांपत्य जीवन में प्रेम, सम्मान और सुख-शांति की कामना से पूरे विधि-विधान और श्रद्धा के साथ व्रत एवं पूजा करती हैं. इस दौरान भगवान गौरी-शंकर के साथ विषहरी, नाग-नागिन और नाग देवता की विशेष पूजा की जाती है. धार्मिक मान्यता है कि इस पूजा से वैवाहिक जीवन सुखमय होता है और परिवार में समृद्धि बनी रहती है.
कथा के माध्यम से मिलती है गृहस्थ जीवन की सीख
पंडित आचार्य धर्मेंद्र नाथ मिश्र के अनुसार मधुश्रावणी के दौरान प्रतिदिन विशेष पूजा के साथ व्रत कथा सुनने की परंपरा है. कथा में भगवान शिव और माता पार्वती के दांपत्य जीवन के प्रसंगों के माध्यम से पति-पत्नी के बीच प्रेम, विश्वास, धैर्य, रूठना-मनाना और आपसी समझ जैसे जीवन मूल्यों की शिक्षा दी जाती है. इसका उद्देश्य नवविवाहिताओं को हर परिस्थिति में विवेक, संयम और प्रेम के साथ गृहस्थ जीवन निभाने की प्रेरणा देना है.
ससुराल से आए वस्त्र और भोजन का होता है विशेष महत्व
मधुश्रावणी पर्व की एक विशेष परंपरा यह भी है कि नवविवाहिताएं इन 13 दिनों के दौरान मायके के बजाय ससुराल से भेजे गए वस्त्र, आभूषण, भोजन और फलाहार का ही उपयोग करती हैं. पहले और अंतिम दिन की पूजा विशेष रूप से विस्तृत विधि-विधान के साथ संपन्न होती है. पूजा के बाद परिवार की अनुभवी और वरिष्ठ महिलाएं मधुश्रावणी की कथा सुनाती हैं, जिसे इस पर्व का महत्वपूर्ण हिस्सा माना जाता है.
टेमी दागने की परंपरा और शुभ संयोग बढ़ाएंगे पर्व की महिमा
मधुश्रावणी के समापन पर नवविवाहिताएं सुहागिन महिलाओं को अपने हाथों से खीर का प्रसाद खिलाती हैं और मेहंदी लगाती हैं. अंतिम दिन होने वाली टेमी दागने की रस्म इस पर्व की सबसे अनूठी परंपरा मानी जाती है. धार्मिक मान्यता के अनुसार शरीर के चार स्थानों पर टेमी से दागने की यह परंपरा धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष—इन चार पुरुषार्थों का प्रतीक है. इस वर्ष मधुश्रावणी के दौरान नाग पंचमी, मोना पंचमी और मनसा देवी पूजन का भी शुभ संयोग बन रहा है, जिससे मिथिला क्षेत्र में इस पर्व को लेकर श्रद्धालुओं और नवविवाहित परिवारों में विशेष उत्साह देखा जा रहा है.
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लेखक के बारे में
By राजीव कुमार झा
राजीव कुमार झा प्रिंट माध्यम में 20 और डिजिटल माध्यम में पिछले 02 वर्षों से पत्रकारिता में एक्टिव हैं. करियर की शुरुआत हिन्दुस्तान से की. अभी प्रभात खबर ब्यूरोचीफ के पद पर सुपौल में काम कर रहे हैं. शिक्षा, कला-संस्कृति, सामाजिक कार्य व सिनेमा में रुचि रखते हैं.
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