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फर्जी शैक्षणिक प्रमाण पत्र पर वर्षो तक पदस्थ रहे डीपीएम पर विभाग ने कसा शिकंजा

Updated at : 23 Dec 2025 6:08 PM (IST)
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फर्जी शैक्षणिक प्रमाण पत्र पर वर्षो तक पदस्थ रहे डीपीएम पर विभाग ने कसा शिकंजा

इस्तीफे के बाद खुला मामला

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– दो थानों में एफआईआर, करीब 24 लाख की रिकवरी प्रक्रिया शुरू सुपौल. जिले के स्वास्थ्य विभाग में फर्जी शैक्षणिक प्रमाण पत्र के आधार पर वर्षो तक पदस्थ रहे डीपीएम (जिला कार्यक्रम प्रबंधक) मो मिन्नतुल्लाह के खिलाफ विभागीय और कानूनी कार्रवाई लगातार तेज होती जा रही है. मामला सामने आने के बाद न केवल प्राथमिकी दर्ज की गई है, बल्कि अब सरकारी राशि के दुरुपयोग को लेकर लाखों रुपये की रिकवरी की प्रक्रिया भी शुरू कर दी गई है. स्वास्थ्य विभाग और जिला प्रशासन की इस कार्रवाई से जिले के अन्य संविदा और नियमित कर्मियों में भी हड़कंप मचा हुआ है. फर्जी प्रमाण पत्र मामले में आरोपी डीपीएम मो मिन्नतुल्लाह के खिलाफ अब तक दो अलग-अलग थानों में प्राथमिकी दर्ज की जा चुकी है. पहली प्राथमिकी 19 दिसंबर को सिविल सर्जन डॉ ललन कुमार ठाकुर द्वारा सदर थाना में दर्ज कराई गई थी, वहीं दूसरी प्राथमिकी 22 दिसंबर को सरायगढ़-भपटियाही सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र के प्रभारी चिकित्सा पदाधिकारी डॉ चंद्रभूषण मंडल द्वारा भपटियाही थाना में दर्ज कराई गई है. दोनों मामलों में आरोपी पर धोखाधड़ी समेत सुसंगत धाराओं के तहत केस दर्ज करते हुए न्यायोचित कार्रवाई की मांग की गई है. करीब 24 लाख रुपये रिकवरी की नोटिस सिविल सर्जन डॉ ललन कुमार ठाकुर ने बताया कि आरोपी डीपीएम के खिलाफ कार्यकाल के दौरान सरकारी राशि के दुरुपयोग और अवैध रूप से वेतन व अन्य लाभ प्राप्त करने के मामले में रिकवरी की प्रक्रिया शुरू कर दी गई है. इस संबंध में लगभग 24 रुपये की रिकवरी की नोटिस भेजी गयी है. नोटिस में स्पष्ट किया गया है कि फर्जी प्रमाण पत्र के आधार पर सेवा में बने रहने के दौरान प्राप्त की गई समस्त राशि सरकारी धन की श्रेणी में आती है, जिसकी वसूली अनिवार्य है. वर्षों तक विभिन्न पदों पर रहा पदस्थ आरोपी डीपीएम मो मिन्नतुल्लाह दरभंगा जिले के अलीनगर थाना क्षेत्र अंतर्गत धमसैन गांव का निवासी है. वह 16 फरवरी 2019 से 06 फरवरी 2022 तक सरायगढ़-भपटियाही सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र में प्रखंड स्वास्थ्य प्रबंधक के पद पर कार्यरत रहा. इसके बाद 07 फरवरी 2022 से 02 अगस्त 2025 तक सदर अस्पताल में डीपीएम (जिला कार्यक्रम प्रबंधक) के पद पर पदस्थापित रहा. इन वर्षों के दौरान उसने स्वास्थ्य विभाग की कई महत्वपूर्ण योजनाओं और कार्यक्रमों के क्रियान्वयन में अहम भूमिका निभाई. ऐसे में अब सवाल उठ रहे हैं कि फर्जी प्रमाण पत्र के आधार पर पदस्थ व्यक्ति द्वारा लिए गए निर्णयों और किए गए कार्यों की वैधता क्या होगी. जिला प्रशासन इस पहलू पर भी मंथन कर रहा है. इस्तीफे के बाद खुला मामला जानकारी के अनुसार 02 अगस्त 2025 को डीपीएम मो मिन्नतुल्लाह ने स्वास्थ्य कारणों का हवाला देते हुए अपने पद से त्यागपत्र दे दिया था. बताया जाता है कि खबर सामने आने से एक दिन पहले यानि एक अगस्त की सुबह ही वह अवकाश पर चले गए थे. इसके बाद 02 अगस्त को छुट्टी के दौरान ही उन्होंने सिविल सर्जन को अपना इस्तीफा भेज दिया. इसी दिन उनकी पत्नी निखत जहां प्रवीण, जो अनुमंडलीय अस्पताल निर्मली में अस्पताल प्रबंधक के पद पर कार्यरत थी. वह भी सिविल सर्जन को ई-मेल के माध्यम से अपना इस्तीफा भेज दिया. अपने त्यागपत्र में उन्होंने लिखा कि उनके पति का स्वास्थ्य ठीक नहीं है. उनकी देखभाल के लिए उनके साथ रहना आवश्यक है. इसलिए वह भी अपने पद से त्यागपत्र दे रही हैं. पति-पत्नी के एक साथ इस्तीफे ने उस समय कई सवाल खड़े कर दिए थे. इसके बाद जिलाधिकारी सावन कुमार द्वारा पूरे मामले की जांच के आदेश दिए गए. जिसमें फर्जी शैक्षणिक प्रमाण पत्र का मामला स्पष्ट रूप से सामने आया. फर्जी डिग्री का खुलासा जांच के दौरान यह तथ्य सामने आया कि डीपीएम मो मिन्नतुल्लाह ने मेघालय स्थित चंद्र मोहन झा (सीएमजे) विश्वविद्यालय से मैनेजमेंट की डिग्री प्राप्त करने का दावा किया था. जबकि वास्तविकता यह है कि यह विश्वविद्यालय वर्ष 2014 में ही मेघालय सरकार द्वारा बंद कर दिया गया था. इतना ही नहीं, विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) ने भी सीएमजे विश्वविद्यालय को फर्जी घोषित कर रखा है. इस संबंध में शिक्षा विभाग को कार्रवाई की सिफारिश की जा चुकी है। वर्ष 2025 में सुप्रीम कोर्ट ने भी मेघालय सरकार के इस फैसले को बरकरार रखते हुए विश्वविद्यालय को अवैध ठहराया है. ऐसे में स्पष्ट है कि आरोपी डीपीएम द्वारा प्रस्तुत की गई डिग्री न केवल अमान्य थी, बल्कि उसे सरकारी सेवा में नियुक्ति के लिए उपयोग करना गंभीर अपराध की श्रेणी में आता है. विभागीय साख पर भी सवाल इस पूरे मामले ने स्वास्थ्य विभाग की कार्यप्रणाली पर भी गंभीर सवाल खड़े कर दिए है. सवाल यह उठ रहा है कि फर्जी विश्वविद्यालय की डिग्री के आधार पर कोई व्यक्ति वर्षों तक सरकारी पद पर कैसे बना रहा. नियुक्ति के समय और बाद में प्रमाण पत्रों की जांच में किस स्तर पर चूक हुई, इसकी भी जांच की जा रही है. जानकारी अनुसार इस मामले के बाद अन्य संविदा और प्रबंधकीय पदों पर कार्यरत कर्मियों के शैक्षणिक प्रमाण पत्रों की भी दोबारा जांच कराई जा सकती है. ताकि भविष्य में इस तरह की अनियमितताओं पर रोक लगाई जा सके. पारदर्शिता के साथ हो रही जांच : सीएस सिविल सर्जन डॉ ललन कुमार ठाकुर ने कहा है कि फर्जी प्रमाण पत्र के मामले में किसी को भी बख्शा नहीं जाएगा. आरोपी डीपीएम के खिलाफ कानूनी कार्रवाई के साथ-साथ विभागीय स्तर पर भी सभी आवश्यक कदम उठाए जा रहे हैं. कहा कि इस मामले में पारदर्शिता के साथ जांच की जा रही है. आगे और भी खुलासों की संभावना फिलहाल प्राथमिकी दर्ज होने और रिकवरी प्रक्रिया शुरू होने के बाद पूरे मामले की गहन जांच चल रही है. जानकारों का मानना है कि जांच आगे बढ़ने के साथ ही और भी कई चौंकाने वाले तथ्य सामने आ सकते हैं. यह भी देखा जा रहा है कि कहीं इस पूरे प्रकरण में अन्य अधिकारियों या कर्मचारियों की भूमिका तो संदिग्ध नहीं रही. कुल मिलाकर, फर्जी शैक्षणिक प्रमाण पत्र के आधार पर वर्षों तक पदस्थ रहे डीपीएम मो मिन्नतुल्लाह का मामला न केवल सुपौल जिले, बल्कि पूरे राज्य के स्वास्थ्य विभाग के लिए एक बड़ी चेतावनी के रूप में सामने आया है.

डिस्क्लेमर: यह प्रभात खबर समाचार पत्र की ऑटोमेटेड न्यूज फीड है. इसे प्रभात खबर डॉट कॉम की टीम ने संपादित नहीं किया है

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RAJEEV KUMAR JHA

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By RAJEEV KUMAR JHA

RAJEEV KUMAR JHA is a contributor at Prabhat Khabar.

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