1789 ई में हुई थी लोकतंत्र में स्वतंत्रता, समानता व भातृत्व की स्थापना

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1789 ई में हुई थी लोकतंत्र में स्वतंत्रता, समानता व भातृत्व की स्थापना ¸f°fQf°ff ´fi°¹ffdVf¹fûÔ ÀfZ »fûIY°faÂf IZY ¸fWX°U ªff³f³fZ IYû W`X ¶fZIYSXfSX फोटो – 03 से 10कैप्सन- राय शुमारी में शामिल मतदाता का फाइल फोटोसुपौल लोकतंत्र ऐसा शासन है जिसमें लोगों का, लोगों के लिए व लोगों के द्वारा शासन किया जाता है. अप्रत्यक्ष […]

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1789 ई में हुई थी लोकतंत्र में स्वतंत्रता, समानता व भातृत्व की स्थापना ¸f°fQf°ff ´fi°¹ffdVf¹fûÔ ÀfZ »fûIY°faÂf IZY ¸fWX°U ªff³f³fZ IYû W`X ¶fZIYSXfSX फोटो – 03 से 10कैप्सन- राय शुमारी में शामिल मतदाता का फाइल फोटोसुपौल लोकतंत्र ऐसा शासन है जिसमें लोगों का, लोगों के लिए व लोगों के द्वारा शासन किया जाता है. अप्रत्यक्ष लोकतंत्र के तहत मतदाता अपने जन प्रतिनिधि का चुनाव कर उन्हें शासन व कानून का अधिकार प्रदान करते आ रहे हैं. लोकतांत्रिक शासन व्यवस्था का प्रमाण ईसा पूर्व 6वीं शताब्दी से ही कपिलवस्तु के शाक्य, अलकंप के बुलि, केरूपुत के कालाम, रामग्राम, कुशीनारा के मल्ल, पिल्पलीवन के मौरिय, वैशाली के लिच्छवी व मिथिला के विदेह में देखने को मिलता है. इस समय शासन का प्रधान राजा ही होता था. लेकिन राजा निर्वाचित होता था और वास्तविक शक्ति केंद्रीय समिति के पास होती थी. जिसमें जनता द्वारा चुने हुए प्रतिनिधि शामिल होते थे. बाद के समय में 1789 में हुई फ्रांसीसी क्रांति ने लोकतंत्र के लिए स्वतंत्रता, समानता और भातृत्व जैसे तीन तत्वों को स्थापित किया.लोकतंत्र में चुनाव के उद्देश्य से क्षेत्रों को जनसंख्या अनुरूप कई हिस्सों में बांटा गया. जिसे निर्वाचन क्षेत्र की संज्ञा दी गयी है. अप्रत्यक्ष लोकतंत्र में वोटरों की अहम भूमिका रही है. वर्तमान परिवेश में राजनीति में बढ़ रही अपराधीकरण को लेकर कोसी क्षेत्र में शांतिपूर्ण व भय मुक्त वातावरण में मतदान करायी जा सके. इसके लिए चुनाव आयोग से लेकर स्थानीय प्रशासन द्वारा बेहतर तैयारी की जा रही है. चुनाव को लेकर प्रतिनियुक्त निर्वाची पदाधिकारी द्वारा मतदान कार्य में लगाये गये कर्मियों से हरेक केंद्र की जानकारी ली जा रही है. ताकि मतदाताओं को मतदान करने में परेशानी का सामना ना करनी पड़े. वहीं प्रत्याशियों द्वारा प्रतिदिन अधिक से अधिक मतदाताओं से संपर्क साधा जा रहा है. यहां तक कि ऐसे परिवार जिनका मुखिया बाहरी प्रदेशों में रह कर कमाई कर रहे हैं. उन परिवारों के गृहिणी से उनके मुखिया सहित युवा व बच्चों का भी हाल चाल ले रहे हैं. ताकि वे सभी अपना वोट उनके पक्ष में दें. वहीं कुछ प्रत्याशी समय के अभाव के कारण स्थानीय मुखिया व वार्ड सदस्यों से संपर्क साध कर मतदाताओं को उनके पक्ष में मत का दान करने की योजना बनाने के कार्य में जुटे हैं. लेकिन मतदाता अपने क्षेत्र से चुनाव लड़ रहे प्रत्याशियों से लोकतंत्र के स्वरूप के बारे में जानने को बेकरार दिख रहे हैं. सूबे में किसकी सरकार बने और आपका जन प्रतिनिधि कैसा हो. इसे लेकर प्रभात खबर द्वारा ली गयी रायशुमारी में क्षेत्र मे लोगों ने अपनी- अपनी प्रतिक्रिया इस प्रकार से दिया. डॉ रंजन कुमार ने बताया कि सरकार ऐसा होना चाहिए जो गरीबों के हित का कार्य करे. प्रत्येक समाज में ऊच व नीच के दायरे को कोई सरकार नहीं बदल सकता. लेकिन गरीबों को भी समुचित संसाधन से लैस किया जा सकता है. डॉ घनश्याम सिंह ने प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए कहा कि इस चुनाव मंे उसी की सरकार बनेगी जो शिक्षा, स्वास्थ्य, सड़क , बिजली, पानी सहित अन्य योजनाओं को अपने पार्टी के एजेंडों में शामिल करेंगी. प्रो निखिलेश कुमार सिंह का मानना है कि आजादी के बाद से अब तक हुए कई चुनावों में उन्होंने वोट किया है. लेकिन विभिन्न सरकार द्वारा क्षेत्र के विकास किये जाने की कवायद की गयी. बावजूद इसके अब तक अपेक्षित विकास नहीं किया गया. बताया कि जन प्रतिनिधि ऐसा हो जो मानव विकास की बात करें. अधिवक्ता संजीव कुमार ने बताया कि सूबे को ऐसी सरकार की दरकार है. जो जन मानस की भावनाओं का कद्र करे. साथ ही क्षेत्र की समस्या को लेकर स्थानीय जन प्रतिनिधियों द्वारा दी जा रही जानकारी को ससमय तरजीह दे. अधिवक्ता आलोक कुमार का मानना है कि जिस प्रकार से सरकार बनाने के लिए एक -एक वोट का महत्व रहा है. उसी प्रकार सरकार को वोट का अहमियत समझना चाहिए. अधिवक्ता कंचन कुमार सिंह ने बताया कि विभिन्न पार्टियों द्वारा सरकार बनाने को लेकर एक – एक प्रत्याशी के जीत के लिए दिन रात एक कर देते है. सरकार गठन के बाद भी क्षेत्र की विकास के लिए इसी तरीके का मेहनत किया जाना जरूरी है. उपेंद्र प्रसाद मंडल ने राय देते हुए बताया कि राज नेताओं को जातिवाद व सांप्रदायिक बातों को छोड़ कर मतदाताओं के हित की बात करनी चाहिए. मतदाता व क्षेत्र के विकास पर ध्यान दिया जाना अनिवार्य है. डॉ पुरुषोत्तम वर्मा ने बताया कि 1990 के बाद से राजनीति का स्वरूप में काफी बदलाव आया है. सरकार को बदलाव के स्वरूप को ध्यान में रख कर कार्य करनी चाहिए. ताकि क्षेत्र का अपेक्षित विकास संभव हो सके.

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