पीएम नकुल संजीवनी योजना के तहत दुधारू पशुओं की हो रही पहचान, की जा चुकी है 500 पशुओं की टैगिंग

Updated at : 08 Jan 2020 7:24 AM (IST)
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पीएम नकुल संजीवनी योजना के तहत दुधारू पशुओं की हो रही पहचान, की जा चुकी है 500 पशुओं की टैगिंग

संजय कुमार पप्पू, छातापुर : प्रधानमंत्री नकुल संजीवनी योजना अंतर्गत दुधारू पशुओं को विशेष पहचान 12 अंकों का ईयर टैग (कनौसी) लगाया जा रहा है. ईयर टैग के बाद उक्त पशुओं के लिए अनुकूल स्वास्थ्य पत्र भी जारी किया जाता है, जो एक प्रकार का आधार कार्ड है. टैगिंग के बाद पशुओं की विशेष पहचान […]

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संजय कुमार पप्पू, छातापुर : प्रधानमंत्री नकुल संजीवनी योजना अंतर्गत दुधारू पशुओं को विशेष पहचान 12 अंकों का ईयर टैग (कनौसी) लगाया जा रहा है. ईयर टैग के बाद उक्त पशुओं के लिए अनुकूल स्वास्थ्य पत्र भी जारी किया जाता है, जो एक प्रकार का आधार कार्ड है.

टैगिंग के बाद पशुओं की विशेष पहचान नंबर ऑनलाईल डाटा साफ्टवेयर पर अपलोड कर दिया जाता है. दुधारू पशु के अलावे कृत्रिम गर्भधारण कराने वाले पशुओं की भी इयर टेगिंग की जा रही है. ताकि दुधारू पशुओं के प्रजनन तथा स्वास्थ्य संबंधी मामलों में बेहतर सेवाएं दी जा सके.
500 पशुओं का किया गया टेगिंग
पशु चिकित्सालय छातापुर के भ्रमणशील चिकित्सक डॉ विपीन कुमार ने बताया कि दिसंबर 2019 में यह टेगिंग का कार्य प्रारंभ किया गया है और एक सप्ताह में छातापुर, घीवहा, लक्ष्मीपुर खूंटी एवं बलुआ बाजार में अब तक पांच सौ से अधिक ऐसे पशुओं की 12 डिजिट के नंबर से टेगिंग की गई है.
इसके अलावे बलुआ चिकित्सालय के डॉ राहुल कुमार एवं छातापुर चिकित्सालय कर्मी मो जाहिद ईकबाल एवं मणि प्रसाद टैगिंग के कार्य में शामिल हैं. इयर टेगिंग को लेकर पशु पालकों में गलत धारणा बनी हुई है. जिस कारण टेगिंग कार्य में परेशानी हो जाती है.
जबकि टेगिंग के बाद भी पशुपालक अपने पशु की खरीद बिक्री कर सकते हैं. एक क्लिक से मिलेगी पूरी जानकारी . चिकित्सक डॉ कुमार ने बताया कि इयर टेगिंग नंबर पर एक क्लिक के बाद पशु और उसके पालक की संपूर्ण जानकारी प्राप्त हो जाती है. जिससे पशुओं के समुचित उपचार में चिकित्सक को सहूलियत होती है.
विशेष पहचान संख्या (यूआईडी) के माध्यम से पशु की नस्ल, उम्र, आखिरी प्रजनन व गर्भधारण का समय, दूध की मात्रा, पूर्व की बिमारीयां, दी जाने वाली दवाइयों की जानकारी जुटा कर उसका रिकार्ड तैयार किया जाता है. उन्होंने बताया कि जागरूकता के अभाव में पशु चिकित्सालय में पूर्व की अपेक्षा मवेशी पालक नहीं पहुंचते हैं.
जबकि बीते एक वर्ष से वे लगातार अस्पताल में मौजूद रहते हैं. जहां गाहे बगाहे ही पशु का उपचार कराने पालक पहुंचते हैं. बताया कि पशु चिकित्सालय में फिलहाल जरूरी दवाएं कृमी नाशक, डायरिया, बुखार, भूख में कमी, दूध बढाने वाला पाउडर, पौष्टिक आहार आदि उपलब्ध है.
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