ललित बाबू का मिटने लगा है अस्तित्व

Published at :18 Jun 2017 5:22 AM (IST)
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ललित बाबू का मिटने लगा है अस्तित्व

नाराजगी. ललित बाबू की उपेक्षा से दुखी हैं मिथिला के लोग, बतायी राजनीतिक साजिश प्रशासनिक उपेक्षा के कारण सुपौल में अब स्वर्गीय ललित नारायण मिश्र का अस्तित्व धीरे-धीरे मिटने लगा है. लोगों को इस बात का मलाल है कि, जिन्होंने सुपौल को इतनी बड़ी पहचान दी, आज उन्हें ही भुलाने की कोशिश की जा रही […]

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नाराजगी. ललित बाबू की उपेक्षा से दुखी हैं मिथिला के लोग, बतायी राजनीतिक साजिश

प्रशासनिक उपेक्षा के कारण सुपौल में अब स्वर्गीय ललित नारायण मिश्र का अस्तित्व धीरे-धीरे मिटने लगा है. लोगों को इस बात का मलाल है कि, जिन्होंने सुपौल को इतनी बड़ी पहचान दी, आज उन्हें ही भुलाने की कोशिश की जा रही है.
वीरपुर : स्व ललित नारायण मिश्र का व्यक्तित्व और कृतित्व देश और प्रदेश में किसी पहचान की मुहताज नहीं है. उनके बलिदान का ही नतीजा है कि आज भी ललित बाबू का नाम संपूर्ण मिथिला वासियों के जेहन में है. उनके नेतृत्व व कौशल क्षमता के कारण ही उनकी शहादत दिवस को बलिदान दिवस के रूप में मनाया जाता है.
3 जनवरी 1975 को समस्तीपुर की एक सभा में बम लगने से उनकी मौत हो गयी. उनकी मौत से मिथिला ही नहीं बल्कि, पूरे प्रदेश में मातम छा गया था. राज्य सरकार ने भी उनके शहादत दिवस को बलिदान दिवस के रूप में मनाने की घोषणा की. साथ ही वीरपुर का नाम उनके नाम पर ललित नगर रख दिया गया और कॉलेज, अस्पताल व डाकघर का नामाकरण भी उनके नाम पर हुआ.
कॉलेज व अस्पताल का नाम तो आज भी उन्हीं के नाम पर है. लेकिन अन्य जगहों से स्व मिश्र का नाम धीरे-धीरे मिटने लगा है. वीरपुर बाईपास बरमासेल, विश्वकर्मा कॉलेज मोड़, हॉस्पिटल चौराहा, गौल चौक व बलुआ-भीमपुर जाने वाली सड़क में बलुआ थाना के पास एक जमाने में बड़े-बड़े गेट बने हुए थे. जिन पर ललित नगर में आपका स्वागत है या ललित समाधि स्थल लिखा हुआ होता था. सड़क निर्माण कंपनियों ने सड़क निर्माण के दौरान जब इन गेटों को तोड़ना चाहा,
तब लोगों ने विरोध भी किया. कंपनी द्वारा आश्वासन के बाद कि सड़क निर्माण के बाद पुन: इससे भव्य गेट का निर्माण किया जायेगा, तब जाकर लोगों ने विरोध बंद कर दिया. लेकिन सड़क निर्माण बाद कंपनियों द्वारा दोबारा गेटों का निर्माण नहीं किया गया. जिससे स्थानीय लोग काफी आक्रोशित है. लोगों का आरोप है कि राजनीतिक साजिश के तहत ललित बाबू की स्मृति को धीरे-धीरे मिटाने की साजिश की जा रही है. लोगों आरोप है कि कौशिकी भवन व अन्य योजनाओं के उद्घाटन व शिलान्यास के क्रम में बिहार के मुख्यमंत्री व अन्य मंत्रियों ने भी कार्यक्रम में एक बार भी स्व मिश्र का नाम तक नहीं लिया. जिससे मिथिला वासियों की भावना को ठेस पहुंची है.
रामू कुमार राय नगर पंचायत के वार्ड नंबर 01 निवासी कहते हैं कि ललित बाबू का नाम मिथिला के कण-कण में बसा है. बावजूद मुख्यमंत्री के कार्यक्रम में ललित बाबू की अनदेखी की गयी, जिससे वीरपुर के लोग काफी आहत हैं. श्री राय ने कहा कि नव निर्मित कौशिकी भवन में ललित बाबू की प्रतिमा लगे, यही यहां की जन भावना है.
गीता देवी पूर्व जिप सदस्य भीमनगर कहती हैं कि भारत-नेपाल के बीच बेहतर मैत्री संबंध स्थापित करने में ललित बाबू का बहुत बड़ा योगदान रहा है. भीमनगर स्थित भारत-नेपाल पर बना मैत्री द्वार भी उसी की एक निशानियों में एक था. लेकिन समय के साथ वह द्वार भी ध्वस्त हो गया. ललित बाबू की निशानी को धीरे-धीरे समाप्त करने की कोशिश की जा रही है.
सुजीत कुमार मिश्रा समाजसेवी कहते हैं कि ललित बाबू के नाम पर भव्य गेट के साथ कौशिकी भवन में उनकी आदम कद प्रतिमा अवश्य लगनी चाहिए. उन्होंने मुख्यमंत्री का ध्यान आकृष्ट करते हुए यहां की जन भावना का सम्मान करने की मांग की. स्व ललित नारायण मिश्र के सहपाठी रह चुके श्री मिश्रा कहते हैं कि राजनीतिक विचार धारा अलग रहने के बावजूद स्व मिश्र से उनकी गहरी मित्रता थी. यहां की जन भावनाओं को देखते हुए वीरपुर-बीहपुर एनएच 72 व एनएच 106 का नामकरण ललित बाबू के नाम पर करने का विचार मुख्यमंत्री को करना चाहिए.
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