बिहार बंद के दौरान भाजपा का झंडा हटाने का विवाद, 1996 की घटना फिर आई चर्चा में

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बीजेपी नेता एवं वार्ड पार्षद के घर के बाहर प्रदर्शन करते उपद्रवी | Prabhat Khabar Network

बीजेपी नेता एवं वार्ड पार्षद के घर के बाहर प्रदर्शन करते उपद्रवी

सीवान में बिहार बंद के दौरान बीजेपी के झंडे को हटाने के दबाव ने 1996 की पुरानी घटनाओं की यादें ताजा कर दी हैं। जानें क्या है पूरा मामला और राजनीतिक चर्चा।

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सीवान में 25 जुलाई को नीट परीक्षा में कथित पेपर लीक, केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग तथा जंतर-मंतर और पटना में छात्रों पर लाठीचार्ज के विरोध में बुलाए गए बिहार बंद के दौरान एक घटना ने शहर में राजनीतिक चर्चा तेज कर दी. उग्र प्रदर्शनकारियों ने बबुनिया मोड़ स्थित भाजपा के तोरण द्वार को क्षतिग्रस्त कर दिया. इसके बाद प्रदर्शनकारियों ने भाजपा के पूर्व नगर अध्यक्ष एवं वार्ड पार्षद अमित कुमार सिंह उर्फ सोनू सिंह के मकान पर लगे भाजपा के झंडे को हटाने का दबाव बनाया.

परिजनों ने हटाया झंडा, तब शांत हुआ मामला

बताया गया कि प्रदर्शनकारियों के दबाव के बाद परिजनों ने मकान पर लगा भाजपा का झंडा हटा दिया, जिसके बाद स्थिति सामान्य हुई. घटना का वीडियो सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो गया. उत्तर प्रदेश के एक राष्ट्रीय दल के नेता ने भी वीडियो साझा करते हुए लिखा, "अब उतर रहे हैं डर से बीजेपी के झंडे." इसके बाद यह मामला राजनीतिक बहस का विषय बन गया.

1996 की चर्चित घटना की फिर होने लगी चर्चा

इस घटना के बाद शहर के लोगों ने 15 मई 1996 की उस चर्चित घटना को याद किया, जब नगर थाना क्षेत्र की सब्जी मंडी में व्यवसायी ओंकारमल सरैया की दिनदहाड़े गोली मारकर हत्या कर दी गई थी. स्थानीय स्तर पर लंबे समय से यह दावा किया जाता रहा है कि उन्होंने अपने मकान से भाजपा का झंडा हटाने से इनकार किया था, जिसके बाद उनकी हत्या कर दी गई थी. हालांकि, इस दावे की स्वतंत्र पुष्टि इस खबर में नहीं की गई है.

कानून-व्यवस्था को लेकर फिर छिड़ी बहस

स्थानीय लोगों का कहना है कि वर्ष 2005 से पहले सीवान में कानून-व्यवस्था को लेकर व्यापक चिंता रहती थी. उस दौर में तत्कालीन जिलाधिकारी सी.के. अनिल और पुलिस अधीक्षक रत्न संजय ने अपराध नियंत्रण के लिए कई अभियान चलाए थे. बिहार बंद के दौरान हुई ताजा घटना के बाद एक बार फिर शहर में कानून-व्यवस्था और राजनीतिक माहौल को लेकर चर्चा तेज हो गई है.

राजनीतिक सहिष्णुता पर उठे सवाल

घटना के बाद कई लोगों का मानना है कि लोकतांत्रिक व्यवस्था में किसी भी व्यक्ति पर किसी राजनीतिक दल का झंडा लगाने या हटाने के लिए दबाव बनाना उचित नहीं है. लोगों ने कहा कि ऐसे मामलों में कानून का समान रूप से पालन होना चाहिए और सभी नागरिकों की अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का सम्मान किया जाना चाहिए.


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अमरनाथ शर्मा

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By अमरनाथ शर्मा

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