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फ्लाइ ऐश की जगह हो रहा है लाल ईंट का इस्तेमाल

Updated at : 30 Aug 2019 1:01 AM (IST)
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फ्लाइ ऐश की जगह हो रहा है लाल ईंट का इस्तेमाल

सीवान : सरकारी इमारतों में लाल ईंट की जगह फ्लाइ ऐश से बनी ईंट से इमारतों को निर्माण कराना अनिवार्य कर दिया गया है. लेकिन सरकारी इमारतों और भवनों को लाल ईंट का ही प्रयोग हो रहा है. चाहे वह निर्माण हो या मेंटेनेंस. पुरानी पद्धति से लाल ईट से भवनों का निर्माण बड़े पैमाने […]

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सीवान : सरकारी इमारतों में लाल ईंट की जगह फ्लाइ ऐश से बनी ईंट से इमारतों को निर्माण कराना अनिवार्य कर दिया गया है. लेकिन सरकारी इमारतों और भवनों को लाल ईंट का ही प्रयोग हो रहा है. चाहे वह निर्माण हो या मेंटेनेंस.

पुरानी पद्धति से लाल ईट से भवनों का निर्माण बड़े पैमाने पर होता रहा है. इससे मिट्टी में अलुवियल तत्व की कमी हो रही है. अलुवियम खेती के लिए उपयोगी तत्व है. इससे जमीन की उर्वरा शक्ति में कमी आ रही है. यहीं वजह है कि सरकार ने सरकारी इमारतों के साथ निजी बिल्डरों से भी बड़े प्रोजेक्ट में फ्लाइ ऐश ब्रिक्स के इस्तेमाल का निर्देश दिया है.
जानकार बताते हैं कि राज्य में उत्पादित फ्लाइ ऐश के 50 फीसदी की खपत हो रही है. आवास एवं पर्यावरण विभाग के अफसरों का कहना है कि फ्लाइ ऐश का उपयोग सभी सरकारी एजेंसियों में अनिवार्य कर दिया गया है. इसके अलावा प्रोजेक्ट बिल्डरों को भी यह कहा जा रहा है कि अब वे लाल ईंटों का उपयोग पूरी तरह से बंद कर दें.
प्रधानमंत्री आवास योजना में है अनिवार्य : केंद्र सरकार ने प्रधानमंत्री आवास योजना से बनने वाले मकानों में भी फ्लाइ ईंट को लगाना अनिवार्य कर दिया है. इसके साथ ही आने वाले योजनाओं में बनने वाले मकान या अन्य तरह के निर्माण में फ्लाइ ऐश से बने ईंट को लगाना अनिवार्य किया गया है. पर्यावरण वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय की अधिसूचना के आधार पर इसकी अनिवार्यता की गयी है. मगर अभी तक जिले में बनने वाले सभी इंदिरा आवास सहित शौचालयों के निर्माण में लाल ईंट का ही प्रयोग किया गया है.
फ्लाइ ऐश ईंट के फायदे
फ्लाइ ऐश ईंट में लोड लेने की क्षमता अधिक होती है. इसमें पानी सूखने की क्षमता भी अधिक पाई जाती है. बताया जाता है कि मिट्टी निर्मित ईंट से पर्यावरण को काफी नुकसान होता है. फ्लाइ ऐश से ईंट बनाने में ईंधन की तीस प्रतिशत बचत होती है. इससे निर्माण में सीमेंट कम लगता है और यह अधिक मजबूत होता है. पर्यावरण की सुरक्षा के लिए यह काफी जरूरी है. अब कृषि के क्षेत्र में भी इसका उपयोग किया जा रहा है.
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