पुपरी: मिथिलांचल में नवविवाहिताओं का 13 दिवसीय लोकपर्व मधुश्रावणी व्रत तीन अगस्त से शुरू

पुपरी: मिथिलांचल में नवविवाहिताओं का 13 दिवसीय लोकपर्व मधुश्रावणी व्रत तीन अगस्त से शुरू
मिथिलांचल में 13 दिवसीय मधुश्रावणी व्रत की शुरुआत हो गई है। नवविवाहिताएं पति की लंबी उम्र और सुखद वैवाहिक जीवन के लिए मां गौरी और भगवान शिव की पूजा कर रही हैं।
Madhushrawani Vrat Pupri: सावन माह में भोलेनाथ की विशेष कृपा पाने के लिए जहां शिवालयों में भक्तों की भीड़ उमड़ रही है, वहीं मिथिलांचल क्षेत्र में नवविवाहिताओं का 13 दिवसीय मधुश्रावणी व्रत भी तीन अगस्त से शुरू हो जाएगा. हिंदू पंचांग के अनुसार, सावन भगवान शिव को अत्यंत प्रिय महीना माना जाता है. इसी पावन महीने में नाग पंचमी से आरंभ होने वाला मधुश्रावणी व्रत मिथिलांचल की अनूठी परंपरा है. इसे प्रकृति और प्रेम का प्रतीक माना जाता है.
मायके में रहकर ससुराल के भोजन से व्रत, मां गौरी और शिव की होगी पूजा
यह व्रत विशेष रूप से नवविवाहित ब्राह्मण और कायस्थ महिलाएं मां गौरी और भगवान शिव की विधिवत पूजा-अर्चना के साथ करती हैं. मान्यता है कि इस व्रत को रखने से पति की लंबी उम्र, वैवाहिक जीवन में सुख-शांति, सौभाग्य और समृद्धि प्राप्त होती है.
व्रत और पूजा से जुड़ी मुख्य बातें निम्नलिखित हैं:
- पूजा विधान: 13 दिनों तक प्रतिदिन मां गौरी, भगवान शिव, नाग-नागिन, सूर्य व चंद्रमा की पूजा की जाती है.
- कथा वाचन: परिवार की अनुभवी महिला व्रत के दौरान धार्मिक कथाएं सुनाकर वैवाहिक जीवन के मंत्र बताती हैं.
- फूल लोढ़ना व डाली सजाना: शाम को महिलाएं सहेलियों के साथ फूल, बेलपत्र व पत्ते चुनकर 'डाली' सजाती हैं.
- मायके की परंपरा: नवविवाहिताएं मायके में व्रत करती हैं, जबकि फलाहार व भोजन सामग्री ससुराल से आती है.
सावन में शिवभक्ति के साथ मधुश्रावणी व्रत मिथिलांचल की सांस्कृतिक पहचान है. क्षेत्र की नवविवाहिताएं पूरे श्रद्धा के साथ इस व्रत की तैयारियों में जुटी हैं.
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