ग्रीन हाइड्रोजन का इस्तेमाल करके भारत स्टील सेक्टर को कार्बनमुक्त बनाने के साथ-साथ ग्रीन स्टील का वर्ल्ड लीडर भी बन सकता है. इस पर महज 3 फीसदी अतिरिक्त खर्च होंगे. वैश्विक ऊर्जा थिंक टैंक ‘ट्रांजीशनजीरो’ की ताजा रिपोर्ट ‘ग्रीन स्टील, आवर बाय आवर’ में यह बात कही गयी है. इसके मुताबिक, इस खर्च से कोयले की खपत और महंगी गैसों का आयात दोनों कम हो जायेगा. इससे भारत वैश्विक बाजार में प्रतिस्पर्धी भी बना रहेगा और स्वच्छ इस्पात क्रांति का नेतृत्व भी कर सकेगा.20 फीसदी ग्रीन हाइड्रोजन ब्लेंडिंग थ्योरीरिपोर्ट में कहा गया है कि भारत वैश्विक स्तर पर इस्पात क्षेत्र को सबसे किफायती तरीके से डी-कार्बोनाइज (उत्सर्जन मुक्त) कर सकता है. रिपोर्ट के अनुसार, जब भारत की बिजली प्रणालियों और इस्पात उद्योग में 24/7 कार्बन-मुक्त बिजली और 20 फीसदी ग्रीन हाइड्रोजन ब्लेंडिंग को एक साथ नियोजित किया जाता है, तो उत्पादन लागत में लगभग 3 प्रतिशत की मामूली बढ़ोतरी होती है.2030 तक के भारतीय पावर ग्रिड मॉडल पर आधारित रिसर्चशोधकर्ताओं ने भारत के विभिन्न क्षेत्रीय ग्रिडों के वर्ष 2030 तक के प्रति-घंटे पावर सिस्टम मॉडल का विश्लेषण किया है. रिपोर्ट में इलेक्ट्रिक आर्क और इंडक्शन फर्नेस के साथ-साथ गैस-आधारित डायरेक्ट रिड्यूस्ड आयरन उत्पादन से जुड़े 2 प्रमुख माध्यमों का अध्ययन किया गया.ये भी पढ़ें: क्लाइमेट चेंज से रोटी पर संकट, रात की गर्मी से खतरे में खाद्य सुरक्षाअतिरिक्त सौर ऊर्जा के सदुपयोग से उत्पादन लागत में कमीचौबीसों घंटे (24/7) स्वच्छ बिजली का लक्ष्य पूरा करने के दौरान जो अतिरिक्त सौर या पवन ऊर्जा उत्पन्न होती है, उसे अक्सर बंद करना पड़ता है. इसका उपयोग ग्रीन हाइड्रोजन बनाने में किया जा सकता है. इस एकीकृत मॉडल से सौर ऊर्जा की बर्बादी 90 प्रतिशत तक घट जाती है. हरित हाइड्रोजन व स्वच्छ बिजली दोनों की औसत उत्पादन लागत में भारी कमी आती है.यूरोपीय संघ के CBAM और व्यापारिक चुनौतियों से मिलेगी राहतवैश्विक स्तर पर, विशेष रूप से यूरोपीय संघ द्वारा लागू किये जा रहे कार्बन बॉर्डर एडजस्टमेंट मैकेनिज्म (CBAM) जैसे नियमों के कारण उच्च कार्बन उत्सर्जन वाले भारतीय इस्पात पर भारी पेनल्टी का खतरा मंडरा रहा था. रणनीतियों में बदलाव करके भारतीय इस्पात उद्योग अपने निर्यात को वैश्विक बाजार में प्रतिस्पर्धी बनाये रख सकता है. स्वच्छ इस्पात क्रांति का नेतृत्व भी कर सकता है. इस रिपोर्ट के निष्कर्षों और भारत में नीतियों के क्रियान्वयन पर चर्चा के लिए 2 सितंबर 2026 को ‘ट्रांजीशनजीरो’ एक अंतर्राष्ट्रीय वेबिनार आयोजित करेगा. इसमें वर्ल्ड लेवल के एक्सपर्ट भाग लेंगे.ये भी पढ़ें: भारत ने रचा इतिहास : रिन्यूएबल एनर्जी का उत्पादन पहली बार 100 गीगावाट के पार, बिजली सप्लाई में रिकॉर्ड 42.79% हिस्सेदारीकोयले का यूज घटेगा, गैस का आयात कम होगा : क्रेनट्रांजीशनजीरो के हेवी इंडस्ट्री के प्रमुख वेरिटी क्रेन कहते हैं कि इस्पात क्षेत्र के लिए भारत का 43 प्रतिशत नवीकरणीय ऊर्जा के लक्ष्य से पता चलता है कि उसे मालूम ही नहीं कि इस क्षेत्र में वह क्या कर सकता है. 24X7 कार्बन-मुक्त बिजली पर शिफ्ट से घरेलू कोयले का उपयोग घटेगा. ग्रीन हाइड्रोजन का मिश्रण महंगी आयातित गैस पर निर्भरता को कम करेगा. देश के प्रमुख इस्पात निर्माता दोनों तकनीकों का अलग-अलग परीक्षण कर रहे हैं, लेकिन एकीकृत योजना ही ग्रीन स्टील के मुनाफे का द्वार खोलने वाली चाबी है.ये भी पढ़ें: ग्लोबल वार्मिंग का यूरोपीय ट्रेलर भारत के लिए 3 मोर्चे पर तबाही के संकेत, कोलकाता में हीट इंडेक्स का जानलेवा जालग्रीन हाइड्रोजन के इस्तेमाल से होंगे 5 फायदेकम लागत में बड़ा बदलाव : बिजली और गैस-आधारित तरीकों से इस्पात बनाने वाले भारतीय कारखाने मात्र 3 प्रतिशत अतिरिक्त उत्पादन लागत पर अपने कार्बन उत्सर्जन में भारी कटौती कर सकते हैं.एकीकृत रणनीति : 24/7 कार्बन-मुक्त बिजली (CFE) और ग्रीन हाइड्रोजन का एक साथ (Co-optimisation) उपयोग करने से लागत अलग-अलग प्रयास करने की तुलना में काफी कम आती है.सौर ऊर्जा की बर्बादी रुकेगी : चौबीसों घंटे स्वच्छ ऊर्जा लक्ष्य से उत्पन्न अतिरिक्त नवीकरणीय ऊर्जा को ग्रीन हाइड्रोजन में बदलने से सौर ऊर्जा की बर्बादी (Solar Curtailment) में 90 फीसदी तक की गिरावट आयेगी.वैश्विक कार्बन टैक्स (CBAM) से सुरक्षा : इस तकनीक को अपनाने से भारतीय इस्पात निर्यात पर यूरोपीय संघ के कार्बन बॉर्डर एडजस्टमेंट मैकेनिज्म (CBAM) का प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ेगा.घरेलू कोयले और महंगी आयातित गैस की बचत : चौबीसों घंटे कार्बन-मुक्त बिजली से कोयले की खपत घटेगी और ग्रीन हाइड्रोजन ब्लेंडिंग से महंगी आयातित गैस पर भारत की निर्भरता कम होगी.ये भी पढ़ें: हर दिन 100 गरीबों का पेट भरने वाली काजुली विश्वास की कहानी, जानें कैसे बनीं बंगाल की ‘अन्नपूर्णा’