बरसात में भी सूखने के कगार पर अधवारा और मरहा नदी, सिमटती धारा से किसान चिंतित

Author Baidnath thakur|Edited by Sumit Kumar
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बरसात में भी सूखीं अधवारा और मरहा नदी की धारा

फोटो - अधवारा समूह की बुढ़नद नदी की धारा. | Prabhat Khabar Network

नेपाल की तराई से भारत आने वाली अधवारा और मरहा नदियां इस साल मानसून के मौसम में भी सूखने के कगार पर हैं। सालों भर बहने वाली इन नदियों की धारा जुलाई में सिकुड़ गई है, जिससे किसानों के माथे पर चिंता की लकीरें गहरा गई हैं।

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Rivers dry in monsoon: नेपाल की तराई से निकलकर भारतीय सीमा में प्रवेश करने वाली अधवारा समूह की बुढ़नद और मरहा नदी इस साल मानसून के मौसम में भी सूखने के कगार पर पहुंच गई हैं. सालों भर अविरल बहने वाली इन नदियों की धारा जुलाई के महीने में पूरी तरह सिकुड़ गई है. इससे पूरे इलाके के किसान गहरी चिंता में डूब गए हैं.

90 फीट की नदी महज 10 फीट में सिमटी, खेतों की घटी उर्वरा शक्ति

बरसात के दिनों में आमतौर पर 80 से 90 फीट चौड़ी होकर बहने वाली अधवारा और मरहा नदी की धारा इस समय घटकर महज 10 से 20 फीट रह गई है. प्रखंड क्षेत्र के बलहा मकसूदन व घरमपुर के समीप मरहा नदी, तथा सुर्यपट्टी, केशोपुर, पुरा और रामपुर पच्चासी गांव के पास अधवारा नदी की धारा बीच में सिमट गई है. नदी के पेटे में जगह-जगह ऊंची टीलानुमा मिट्टी उभर आई है. इन नदियों का गाद युक्त पानी अपनी उर्वरा शक्ति के लिए प्रसिद्ध है, जिसके बल पर बिना रासायनिक खाद के भी धान, गेहूं, मक्का, दलहन और गन्ने की बंपर पैदावार होती थी. लेकिन पानी सूखने से सिंचित क्षेत्र बेहद घट गया है.

मछलियों का अकाल और गिरता जलस्तर बना मुसीबत

स्थानीय लोगों का कहना है कि पहले जुलाई से सितंबर तक नदियों में मछलियों की भरमार रहती थी, जिससे बड़ी संख्या में मछुआरों की आजीविका चलती थी. लेकिन पिछले 10 वर्षों में मछलियों की संख्या लगातार कम हुई है. बारिश के बावजूद नदी खाली रहने से भूजल स्तर नीचे चला गया है, जिससे चापाकल पानी छोड़ रहे हैं और धान का बिचरा (पौध) भी नहीं बच पा रहा है.

खेती के साथ नदी के अस्तित्व पर मंडराया संकट

किसान गुलाब ठाकुर, रमेश कुमार, भोगेन्द्र चौधरी, नवीन कुमार, राजकुमार मंडल और समाजसेवी रणजीत कुमार मुन्ना ने बताया कि अतीत में बाढ़ का गाद युक्त पानी खेतों तक लाने के लिए लोग तटबंधों को भी काट देते थे, ताकि भूमि उपजाऊ बने. अब नदी की यह हालत देखकर किसानों को डर है कि यदि जलस्तर इसी तरह गिरता रहा, तो आने वाले वर्षों में इन जीवनदायिनी नदियों का अस्तित्व ही समाप्त हो जाएगा.


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