रामनवमी पशु मेला के अस्तित्व पर संकट

Updated at :17 Apr 2016 7:06 AM
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रामनवमी पशु मेला के अस्तित्व पर संकट

सीतामढ़ी : रामनवमी के अवसर पर प्राचीन काल से ही लगने वाले पशु मेला के अस्तित्व पर संकट का बादल छाने लगा है. सैकड़ों एकड़ परिक्षेत्र में लगने वाला पशु मेला अब सिकुड़ कर काफी छोटा हो गया है. यानि परिक्षेत्र का अधिकांश भाग खाली ही रह जाता है. जानकारों की मानें, तो मशीनरी युग […]

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सीतामढ़ी : रामनवमी के अवसर पर प्राचीन काल से ही लगने वाले पशु मेला के अस्तित्व पर संकट का बादल छाने लगा है. सैकड़ों एकड़ परिक्षेत्र में लगने वाला पशु मेला अब सिकुड़ कर काफी छोटा हो गया है. यानि परिक्षेत्र का अधिकांश भाग खाली ही रह जाता है. जानकारों की मानें, तो मशीनरी युग आ जाने के कारण अब किसान बैल खरीदना लगभग बंद सा कर दिया है. किसी भी गांव में दो-चार जोड़ा से अधिक बैल नहीं पाया जाता है. किसान अब केवल मशीनरी व्यवस्था पर निर्भर है.

नेपाली व्यापारियों का बंद हो गया आना: मेला संवेदक कामेश्वर प्रसाद यादव व शंकर देव प्रसाद शुक्ला समेत अन्य की मानें, तो अब मेले के अस्तित्व पर ही खतरा मंडराने लगा है. पूर्व में प्रदेश के विभिन्न जिलों के अलावा झारखंड व पड़ोसी देश नेपाल के सैकड़ों व्यापारी मवेशियों की खरीद-बिक्री करने यहां आते थे.
अब वह बात नहीं रही. नेपाल के व्यापारी गत वर्षों तक आते थे, परंतु एसएसबी के कारण अब नेपाल के व्यापारियों का भी आना बंद हो गया है. कारण भारतीय सीमा में प्रवेश करते ही एसएसबी द्वारा मवेशियों को जब्त कर लिया जाता है. डर के मारे अब नेपाल के व्यापारियों का आना बिल्कुल बंद हो गया है. इसका सीधा असर मेला पर दिख रहा है.
तीन की जगह अब मात्र एक काउंटर: उनका कहना था कि पूर्व में कौड़ी रसीद काटने के लिए तीन काउंटर की व्यवस्था करनी पड़ती थी. अब एक काउंटर का निर्माण किया जाता है, वह भी खाली रहता है. हालांकि अब भी प्रदेश के विभिन्न जिलों से व्यापारी आते हैं, परंतु मवेशियों की संख्या कम रहने के कारण इनकी संख्या में भारी गिरावट आ रही है. संवेदक का कहना है कि मेला चलाना अब घाटे का सौदा रह गया है.
घंटी-घुडि़या व्यापारियों के समक्ष भुखमरी की हालात: बैलों को सजाने के लिए घंटी,घुडि़या, रास, गरदानी, नाथ, बंजारी, मंगटीका व कौड़ी आदि बेच कर जीवन यापन करने वाले व्यवसायियों के सामने भी संकट छा गया है. पूर्व में प्रति दिन हजारों रूपये का व्यापार होता था. अब प्रति दिन एक हजार रूपये का भी बिक्री नहीं होता है. पूर्व में रामनवमी से दो दिन पूर्व से ही मेला लगना शुरू हो जाता था और पूर्णिमा तक मेला चलता था. अब तीन दिनों में ही मेला समाप्त हो जाता है. संवेदक का कहना था कि मेले की दुर्दशा में प्रशासन व स्थानीय जनप्रतिनिधि भी कम जिम्मेवार नहीं है.
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