कमा के न लबइ त पेट कइसे भरतइ

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कमा के न लबइ त पेट कइसे भरतइफोटो नंबर- 5 ढ़ेंग स्टेशन पर टिकट लेते मजदूर, 6 ट्रेन का इंतजार करते मजदूर, 7 स्टेशन पर सोये मजदूर सुप्पी : विस चुनाव में वोट का प्रतिशत बढ़ाने के लिए राज्य निर्वाचन आयोग के निर्देश पर तरह-तरह के कार्यक्रम चलाये जा रहे हैं. यह कोशिश की जा […]

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कमा के न लबइ त पेट कइसे भरतइफोटो नंबर- 5 ढ़ेंग स्टेशन पर टिकट लेते मजदूर, 6 ट्रेन का इंतजार करते मजदूर, 7 स्टेशन पर सोये मजदूर सुप्पी : विस चुनाव में वोट का प्रतिशत बढ़ाने के लिए राज्य निर्वाचन आयोग के निर्देश पर तरह-तरह के कार्यक्रम चलाये जा रहे हैं. यह कोशिश की जा रही है कि हर वोटर को वोट का महत्व व अधिकार समझा दिया जाये ताकि वे एक नवंबर को हर हाल में बूथ पर जाकर वोट करने को विवश हो जाये. इसके तहत वोटरों को इवीएम व वीवीपैट मशीन से वोट करने का प्रशिक्षण दिया जा रहा है, पर जिस तरह से वोटरों का दूसरे प्रदेशों में कमाने के लिए पलायन हो रहा है, उससे प्रशासन के उक्त अभियान को करारा धक्का लगना तय है. — मजदूरों का पलायन चाहे जिस सरकार की लापरवाही हो, मनरेगा योजना मजाक बन जाने एवं अन्य कार्यों में ग्रामीण क्षेत्रों के मजदूरों को काम नहीं मिलने के कारण मजदूर पलायन कर रहे हैं. करीब-करीब प्रतिदिन सुप्पी के अलावा मेजरगंज व शिवहर जिला के पुरनहिया प्रखंड के दर्जनों मजदूर धान की कटनी के लिए पंजाब जा रहे हैं. उक्त मजदूर ढ़ेंग स्टेशन से ट्रेन पकड़ते हैं. — तब नहीं आयेंगे वोट देने बुधवार की शाम ढ़ेंग स्टेशन पर विभिन्न गांवों के दर्जनों मजदूर पंजाब जाने के लिए आये थे. प्रभात खबर द्वारा विधानसभा चुनाव में वोट किये बगैर पंजाब जाने की बाबत पूछे जाने पर मजदूर कुछ सोचने लगे. बाद में कहा कि कार्तिक में वोट गिराने के समय चले आयेंगे. यह बताने पर कि एक नवंबर को हीं मतदान होना है तो मजदूरों ने कहा कि तब वोट गिराने नहीं आयेंगे. वैसे भी वोट देने से उन्हें अब क कौन सा लाभ मिल गया है. — मजबूरी में जाते हैं बाहर नन्हकार गांव के जगन्नाथ साह, जीतू दास, रामसेवक साह, नंदू दास, राजीव राम, कृष्णनंदन राम व रमेश राम का कहना था कि ‘अहीं सब बताऊ, पानी न भेलइह त घिरस के धान की होतइ. हमनी सब के बाहर जा हीं के पड़तइ. बाहर से न कमा के लबइ त पेट कइसे भरतई’. मजदूरों ने ठेठ गवई अंदाज में अपनी बातें कही. बताया कि साल में चार बार पंजाब जाते हैं. धान की रोपनी व कटनी के अलावा गेहूं व ईंख की कटनी के लिए जाते हैं. यही कमाइ का जरिया है. मजदूरों ने यह कह कर प्रशासन के वोट का प्रतिशत बढ़ाने के तमाम अभियान की सफलता पर पानी फेर दिया कि वोट से कोई हारे-जीते, उन्हें कोई मतलब नहीं है.

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