उफनती धार में नाव से स्कूल जाने को विवश हैं सैकड़ों बच्चे
Updated at : 06 Aug 2019 12:38 AM (IST)
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चार दशक से बागमती नदी कादंश झेल रहे भरथी के ग्रामीण अधिकारी बन गांव की तस्वीर बदलने की बच्चों ने ठानी रून्नीसैदपुर :शासन बदला, सत्ता बदली और समय के साथ अधिकारी भी बदलते गये, लेकिन नहीं बदली तो चार दशक बाद भी भरथी गांव की तस्वीर. युवाओं के चेहरे पर बुढ़ापे की दस्तक व बच्चों […]
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चार दशक से बागमती नदी कादंश झेल रहे भरथी के ग्रामीण
अधिकारी बन गांव की तस्वीर बदलने की बच्चों ने ठानी
रून्नीसैदपुर :शासन बदला, सत्ता बदली और समय के साथ अधिकारी भी बदलते गये, लेकिन नहीं बदली तो चार दशक बाद भी भरथी गांव की तस्वीर. युवाओं के चेहरे पर बुढ़ापे की दस्तक व बच्चों ने युवावस्था में कदम रख दिया है.
चार दशक से विनाशकारी बागमती नदी के तटबंध के बीच में तिल-तिल कर जी रहे गांव के लोगों का भरोसा सरकार पर से उठ चुका हैं. बुजुर्गों की पीड़ा अब युवावस्था में प्रवेश कर रहे बच्चों के लिए चुनौती बन चुकी है. अब वह पढ़-लिख कर अच्छा मुकाम हासिल कर गांव के लोगों को बागमती के अभिशाप से मुक्ति दिलाने के लिए दिल लगाकर पढ़ाई कर रहे है. अब उनके जेहन से मौत का खौफ भी समाप्त हो चुका है. यही कारण है कि बागमती की तेज उफान में दर्जनों लोगों के डूब कर मरने के बाद भी वह स्कूल जाना नही छोड़ रहे है.
सौरभ कुमार, कल्पना कुमारी, मोहित कुमारी, सरिता कुमारी, शालू कुमारी, आदित्य कुमार, सलोनी कुमारी, सोनी कुमारी व विकास कुमार समेत सैकड़ों बच्चे प्रतिदिन शिवनगर घाट पर आते हैं और बागमती की तेज उफान में तकरीबन 450 फीट की दूर तय कर भरथी घाट उतरकर, वहां से दूसरी नाव पकड़ कर बागमती की 150 फीट की उपधारा की दूरी तय कर दूसरे घाट पर उतर कर आदर्श उच्च विद्यालय मधौल जाना उनकी दिनचर्या है. जर्जर नाव के सहारे 35 मिनट की यह दूरी छात्र-छात्राओं के लिए मौत से आंख-मिचौली से कम नहीं है. इसी प्रकार प्राथमिक विद्यालय भरथी कन्या जाने के लिए बागमती में नाव का सफर करना पड़ता है.
80 से पहले खुशहाल गांव था भरथी
ग्रामीणों के अनुसार 80 के दशक से पहले यह गांव भी एक समृद्ध गांव था. लोग खुशहाल थे. वर्ष 1975 में बागमती तटबंध बनाने का सरकार का निर्णय गांव के लोगों के लिए अभिशाप बन गया. तटबंध निर्माण का काम शुरू होने के बाद धीरे-धीरे बागमती नदी के दोनों तटों के बीच आने के कारण यह गांव बागमती नदी के गर्भ में विलीन होता चला गया.
प्रतिवर्ष बागमती के कटाव के कारण अबतक लगभग 200 से अधिक परिवारों के घर नदी में विलीन हो चुके हैं. उनमें रामानंद सिंह, मुन्द्रिका सिंह, रामनारायण सिंह, उपेंद्र सिंह, अभय सिंह, मुसमात कौशल्या देवी, रणधीर सिंह, मधुरेंद्र सिंह, किरण देवी, संजय सिंह व दीपक सिंह समेत सैकड़ों लोगों का नाम शामिल हैं. बागमती तटबंध का निर्माण प्रारंभ होने के समय जल संसाधन विभाग के द्वारा भरथी गांव के पुनर्वास के लिए मझौली उर्फ भनुडीह में 12.95 एकड़ जमीन का अधिग्रहण किया था.
भरथी गांव के लोगों को पुनर्वास हेतु चार दशक पूर्व मझौली उर्फ भन्नुडीह में जमीन का अधिग्रहण किया गया था. इस अधिग्रहण के खिलाफ लोगों ने मुआवजा की राशि नहीं ली. इसी बीच एक जनहित याचिका की सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने विवाद में उलझे पुराने अधिग्रहण को समाप्त करने का फैसला सुनाया. जिसके आलोक में उक्त जमीन को अधिग्रहण से मुक्त कर दिया गया.
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