शेखपुरा : पंचायती राज मंत्री के सामने उठा 18 साल पुराना मुद्दा, घाटकोसुम्भा को बाढ़ग्रस्त क्षेत्र घोषित करने की मांग

बाबा नरपतमल मंदिर में पंचायती राज मंत्री दीपक प्रकाश का स्वागत करते लोग. | Prabhat Khabar Network
Sheikhpura News : पंचायती राज मंत्री दीपक प्रकाश के शेखपुरा दौरे के दौरान घाटकोसुम्भा के ग्रामीणों ने 18 साल पुराने बाढ़ग्रस्त क्षेत्र घोषित करने के मुद्दे को उठाया. 35 हजार की आबादी को राहत दिलाने की गुहार लगाई गई.
Sheikhpura News : पंचायती राज मंत्री दीपक प्रकाश शेखपुरा जिला के दो दिवसीय दौरे पर हैं. इस दौरान वह दूसरे दिन घाटकोसुम्भा टाल बहुल क्षेत्र पहुंचे और विभाग के द्वारा संचालित योजनाओं का औचक निरीक्षण किया. इसी क्रम में वह घाटकोसुम्भा प्रखंड अंतर्गत बाबा नरपतमल मंदिर प्रांगण भी पहुंचे. इस दौरान मंदिर कमेटी के सदस्यों ने मंदिर के समीप विवाह भवन निर्माण की मांग को रखा, जिसे मंत्री ने प्राथमिकता के आधार पर पूरा करने का आश्वासन दिया है. इस दौरान वहां पहुंचे कई गांवों के ग्रामीणों ने अपने पंचायतों की समस्या के निराकरण की मांग को लेकर आवेदन सौंपे.
बाढ़ग्रस्त क्षेत्र घोषित करने की मांग
वहीं, पंचायती राज मंत्री के समक्ष घाटकोसुम्भा प्रखंड को जलजमाव क्षेत्र की जगह बाढ़ग्रस्त क्षेत्र घोषित करने का मुद्दा उठाते हुए लोगों ने इसके निराकरण की मांग की. स्थानीय लोगों ने कहा कि हरोहर नदी में हर साल गंगा के पानी के दबाव के कारण घाटकोसुम्भा प्रखंड क्षेत्र के लोगों को अक्सर बाढ़ का सामना करना पड़ता है.
लेकिन, इस इलाके को जलजमाव क्षेत्र घोषित किए जाने से लोगों को किसी प्रकार की राहत नहीं मिल पाती है, जिससे 35 हजार की आबादी प्रभावित होती है. उधर, इसी नदी के पानी से दूसरे छोर पर बसे लखीसराय जिले के ग्रामीणों को बाढ़ के दौरान होने वाली क्षति का आपदा के तहत मुआवजे की राशि दी जाती है.
पिछले 18 वर्षों से दोहरी नीति का दंश
इस दोहरी नीति के कारण पिछले 18 वर्षों से घाटकोसुम्भा के लोग इस इलाके को बाढ़ग्रस्त क्षेत्र घोषित किए जाने की मांग कर रहे हैं. लखीसराय जिला के बड़हिया प्रखंड के तीन पंचायतों को भी घाटकोसुम्भा प्रखंड में जोड़ने का मामला मंत्री के समक्ष लोगों ने रखा. इस संबंध में पप्पू राज मंडल ने बताया कि घाटकोसुम्भा प्रखंड वासियों को बाढ़ आने पर 2007 से पहले आपदा राहत दी जाती थी, लेकिन 2007 में इसे जलजमाव क्षेत्र घोषित कर दिया गया.
जब भी गंगा का पानी उफनता है, घाटकोसुम्भा वासियों की फसलें नष्ट हो जाती हैं, घरों में रहना मुश्किल हो जाता है, पशु चारे की कमी होती है, स्कूल बंद हो जाते हैं और स्वास्थ्य पर बुरा प्रभाव पड़ता है. इसका खामियाजा इस क्षेत्र की जनता आज तक भुगत रही है. पूर्व में जनप्रतिनिधियों और जिला प्रशासन के अधिकारियों से गुहार लगाई गई, लेकिन 18 वर्षों तक इस समस्या के ऊपर कोई ध्यान नहीं दिया गया.
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