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Chhapra News : अंग्रेजों के खिलाफ क्रांतिकारी गतिविधियों का केंद्र था सोनपुर मेला

Updated at : 14 Nov 2024 10:21 PM (IST)
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Chhapra News : अंग्रेजों के खिलाफ क्रांतिकारी गतिविधियों का केंद्र था सोनपुर मेला

Chhapra News : विश्व प्रसिद्ध हरिहर क्षेत्र सोनपुर मेला का उद्घाटन हो चुका है. लोगों का आना भी शुरू हो चुका है. राजधानी पटना से सटे सारण जिले के सोनपुर में लगने वाला यह मेला एशिया का सबसे बड़ा पशु मेला के रूप में जाना जाता था.

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छपरा. विश्व प्रसिद्ध हरिहर क्षेत्र सोनपुर मेला का उद्घाटन हो चुका है. लोगों का आना भी शुरू हो चुका है. राजधानी पटना से सटे सारण जिले के सोनपुर में लगने वाला यह मेला एशिया का सबसे बड़ा पशु मेला के रूप में जाना जाता था. यह मेला हर साल कार्तिक पूर्णिमा के अवसर पर लगता है. इस मेले को कभी छतर मेला के नाम से भी जाना जाता था, लेकिन अब लोग इस मेले को हरिहरक्षेत्र सोनपुर मेला के नाम से भी जानते है. हरिहर क्षेत्र सोनपुर में प्रसिद्ध और ऐतिहासिक हरिहरनाथ मंदिर है. कार्तिक पूर्णिमा के अवसर पर लगने वाला यह मेला आध्यात्मिक रूप से देवस्थान से शुरू होकर करीब एक महीने तक चलता है. इस मेले की शुरुआत गंगा व गंडक नदी में स्नान के बाद हरिहरनाथ पर जलाभिषेक एवं मंदिर में पूजा-पाठ से होती है. स्वतंत्रता आंदोलन में भी सोनपुर मेला बिहार की क्रांतिकारी गतिविधियों का केंद्र रहा है. वीर कुंअर सिंह अंग्रेजी हुकूमत से संघर्ष के लिए जागरूक करने और अपनी सेना में बहाली के लिए यहां आते थे.

मिथिला जाने के क्रम में आये थे प्रभु राम

राजधानी पटना से लगभग 15 किमी और हाजीपुर से चार से पांच किलोमीटर दूर सोनपुर में लगने वाले इस मेले ने देश दुनिया में पशु मेलों को एक अलग पहचान दी है. यहां हाथियों व घोडों की खरीद हमेशा से सुर्खियों में रहती थी, लेकिन अब हाथी के खरीद बिक्री पर पूर्ण रोक है. कहा जाता है कि मिथिला जाने के क्रम में भगवान राम ने इस स्थान पर शिव की आराधना की थी और एक मंदिर की स्थापना की. लोगों की आस्था है कि कार्तिक पूर्णिमा के दिन यहां नदी में स्नान करने वाले को मोक्ष मिलता है. चूंकि दो पशुओं के युद्ध के कारण भगवान प्रकट हुए इसलिए यहां पशुओं की खरीदी-बिक्री को शुभ माना जाता है. बहरहाल, सोनपुर मेले की ख्याति पशु मेले के रूप में ही रही है. यहां, घोड़े, और पंछी बेचे जाते रहे हैं. सोनपुर मेले में पशुओं का कारोबार केवल व्यापार नहीं है बल्कि यह परंपरा और आस्था दोनों का मिलाजुला स्वरूप भी है. हालांकि सोनपुर मेले का पशु बाजार धीरे-धीरे अपनी चमक खोता जा रहा है.

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