रद्दी के टुकड़ों से देते हैं विचारों को आकृति

Published at :21 Mar 2017 1:58 AM (IST)
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रद्दी के टुकड़ों से देते हैं विचारों को आकृति

छपरा (नगर) : रंगों के साथ कला का चित्रण करते तो हमने कई कलाकारों को देखा है, पर छपरा शहर के 25 वर्षीय रविरंजन कुमार जब कागज के रद्दी टुकड़ों से अपने विचारों को आकृति देते हैं. महान चित्रकार पिकासो द्वारा इजाद किये गए ‘कोलाज’ तकनीक से प्रभावित होकर रविरंजन मॉर्डन कोलाज के फॉर्मूले से […]

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छपरा (नगर) : रंगों के साथ कला का चित्रण करते तो हमने कई कलाकारों को देखा है, पर छपरा शहर के 25 वर्षीय रविरंजन कुमार जब कागज के रद्दी टुकड़ों से अपने विचारों को आकृति देते हैं. महान चित्रकार पिकासो द्वारा इजाद किये गए ‘कोलाज’ तकनीक से प्रभावित होकर रविरंजन मॉर्डन कोलाज के फॉर्मूले से चित्रकला को शानदार अंदाज से अभिव्यक्त कर रहे हैं. इनके बनाये कलाकृतियों में न सिर्फ वेराइटी दिखती है, बल्कि दूरदर्शिता भी झलकती है. निम्न मध्यम वर्गीय परिवार से ताल्लुक रखने वाले रविरंजन को पेंटिंग विरासत में मिली है. पिता चंद्रिका चौधरी छपरा के पुराने साइन बोर्ड पेंटर है.

बेहद कम आमदनी के बीच पिता ने जैसे-तैसे पूरे परिवार को संबल दिया है. हालांकि पिता ने बढ़ती उम्र के कारण अब साइन बोर्ड बनाने का काम बंद कर दिया है और परिवार के 5-6 लोगों की परवरिश का जिम्मा अब रविरंजन के कंधे पर है. एक छोटी सी नंबर प्लेट की दुकान के सहारे रविरंजन का परिवार चलता है. हालांकि संघर्ष को जीवन का आधार मानने वाले रविरंजन तमाम कठिनाइयों के बीच अनवरत चित्रकला के क्षेत्र में बेहतर करने के लिए आज भी प्रयासरत हैं.

पिता से मिले जेब खर्च को बचा कर सीखी चित्रकला : सारण के युवा चित्रकार रविरंजन ने बेहद मुश्किल परिस्थितियों में अपनी कला को मांजने का काम किया है. 15 वर्ष की उम्र में जब रविरंजन पिता के साथ साइनबोर्ड बनाते थे तभी उन्हें गुरु मेंहदी शॉ का सानिध्य प्राप्त हुआ. जेब में इतने पैसे नहीं थे कि रवि गुरु को उनकी दक्षिणा भी दे सकें. रविरंजन के अंदर की ललक को देखते हुए उनके गुरु ने भी 6 माह तक उनसे कोई फीस नहीं ली. हालांकि चित्रकारी के लिए जरूरी उपकरण खरीदने के लिए पैसों की जरूरत पड़ती थी जिसे रवि पिता द्वारा मिले पॉकेट खर्च से पूरी किया करते थे.
कोलॉज तकनीक में माहिर हैं रविरंजन : कोलॉज पेंटिंग की एक ऐसी तकनीक है जिसमें बिना रंगों के ही कैनवास पर आकर्षक चित्रण किया जाता है. रद्दी हो चुके कागजों तथा पुराने न्यूज़ पेपर के टुकड़ों अथवा रंग-बिरंगे कैलेंडरों की कटिंग के द्वारा ही विशेष प्रकार से कलाकृतियां बनायी जाती है. रविरंजन इस तकनीक को मॉडल रूप में विकसित कर दर्जनों पेंटिंग्स बना चुके हैं. अपने प्रतिभा के बदौलत आज रवि की प्रदर्शनियां बिहार के साथ-साथ देश के अन्य राज्यों में भी आयोजित हो चुकी हैं. वहीं उनके द्वारा बनायी गयी कुछ खास कोलाज पेंटिंग्स मुंबई, दिल्ली, नोयडा तथा जयपुर में आयोजित राष्ट्रीय चित्र प्रदर्शनियों में भी शामिल हो चुकी हैं.
बनाया मॉर्डन वाराणसी घाट : वैसे तो रवि ने कोलाज के द्वारा कई आकर्षक पेंटिंग्स बनायी हैं. मदर टेरेसा, जेम्स बांड सीरीज, आधुनिक भारत जैसी कलाकृतियों ने खूब वाहवाही भी बटोरी है पर वाराणसी के प्रसिद्ध गंगा घाट का मॉर्डन स्वरूप उनकी सबसे खास कलाकृतियों में से एक है. इसके माध्यम से रवि ने अपनी दूरदर्शिता को प्रदर्शित किया है. रवि बताते हैं कि इस पेंटिंग के जरिये बनारस गंगा घाट अगले 100 साल बाद कैसा दिखेगा उसे दरसाया गया है. महंगे बोर्ड और अन्य मेटेरियल खरीदना रवि के लिए आसान तो नहीं है, पर अपनी छोटी से नंबर प्लेट बनाने की दुकान से हुई आमदनी को बचा कर वह जरूरी सामान खरीदते हैं.
हालांकि रविरंजन की प्रतिभा और उनके अंदर छुपे सामर्थ्य को अब तक कोई विशेष सहायता नहीं मिल सकी है. बिहार सरकार के कला एवं संस्कृति मंत्री भले इनकी प्रतिभा का लोहा मान चुके हैं, पर स्थानीय प्रशासन व कला विभाग द्वारा न तो कोई आर्थिक सहायता प्रदान की गई है और न ही इनके हौसलों को कोई सम्मान मिला है. हालांकि रविरंजन बगैर किसी सपोर्ट का इंतज़ार किये लगातार अपने अंदर की प्रतिभा को राष्ट्रीय स्तर पर पहचान दिलाने के लिए संघर्षरत हैं.
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