सेल्फ डिपेंडेंट बन दूसरों को दिखा रहे राह

Published at :04 Aug 2015 8:29 AM (IST)
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सेल्फ डिपेंडेंट बन दूसरों को दिखा रहे राह

फूड प्रोडक्ट्स से कर रहे भारी कमाई, राज्य व राज्य के बाहर विभिन्न जिलों में कर रहे आपूर्ति छपरा (सदर)/गड़खा ऑटोमेटिक मशीन से चिउड़ा, मक्के की चिउड़ी तथा सत्तू तैयार कर बेहतर कमाई कर चार दर्जन लोगों को दे रहे हैं रोजगार. गड़खा प्रखंड के महम्मदा में गुप्ता फूड प्रोडक्ट्स नामक उद्योग लगानेवाले तीन भाई […]

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फूड प्रोडक्ट्स से कर रहे भारी कमाई, राज्य व राज्य के बाहर विभिन्न जिलों में कर रहे आपूर्ति
छपरा (सदर)/गड़खा
ऑटोमेटिक मशीन से चिउड़ा, मक्के की चिउड़ी तथा सत्तू तैयार कर बेहतर कमाई कर चार दर्जन लोगों को दे रहे हैं रोजगार. गड़खा प्रखंड के महम्मदा में गुप्ता फूड प्रोडक्ट्स नामक उद्योग लगानेवाले तीन भाई आज सारण के अलावा उत्तरप्रदेश, पटना सहित कई जिलों में चिउड़ा, मक्का चिउड़ी तथा सत्तू की आपूर्ति प्रतिदिन दो से तीन ट्रक करते हैं. पीएमजीएस के तहत जिला उद्योग केंद्र से ऋण स्वीकृत कराने के बाद तीनों भाइयों ने फूड प्रोडक्ट्स के क्षेत्र में नयी ऊंचाइयों में पहुंचने की तमन्ना पाल रखी है. ये खुद आत्मनिर्भर बन दूसरों को राह दिखा रहे हैं.
प्रोडक्ट्स तैयारी में महज पांचवें हिस्से तक आदमी की जरूरत : जहां पुराने चिउड़ा या सत्तू मिल में चिउड़ा या सत्तू की तैयारी के लिए ज्यादा आदमी की जरूरत होती है, वहीं इस ऑटोमेटिक मशीन वाले फूड प्रोडक्ट्स उद्योग में पूर्व के पांचवें हिस्से के बराबर ही आदमी की जरूरत पैकेजिंग आदि के लिए होती है. प्रोपराइटर चंदन कुमार, संजय कुमार, पवन कुमार बताते हैं कि तीनों भाई कोई उद्योग में माल तैयार कराने में, कोई ऑफिसियल कार्य संभालने में, तो कोई क्रय, विक्रय में अपना समय लगाते हैं. वे बताते हैं कि पूर्व में उनके पिता स्व. रामलाल गुप्ता के द्वारा काफी छोटे पैमाने पर चिउड़ा मिल शुरू की गयी थी, परंतु पिता की मौत के बाद व पढ़ाई-लिखाई करने के बाद तीनों भाइयों ने फूड प्रोडक्ट्स की बेहतरी के लिए ऑटोमेटिक मशीन लगायी.
उद्योग शुरू करने के लिए रसरा (यूपी) में ली ट्रेनिंग : चंदन व संजय बताते हैं कि ऑटोमेटिक सिस्टम से चिउड़ा, मक्के की चिउड़ी व सत्तू तैयार करने के लिए उन्होंने यूपी के रसरा में जाकर प्रशिक्षण लिया. इसके बाद काफी कम मानव श्रम के जरूरत वाले पैडी क्लीनर, रोस्टर, फ्लैंकर मशीन, एलीवेटर आदि मशीन उद्योग विभाग से पीएमजीएस के तहत 25 लाख रुपये ऋण लेकर कारोबार शुरू किया.
सबसे बड़ी समस्या विद्युत आपूर्ति की : चंदन बताते हैं कि सारे प्रयास के बावजूद विद्युत की आपूर्ति नहीं सुधरी. अपने खर्च से विद्युत आपूर्ति के लिए उद्योग तक पोल व तार लाने, ट्रांसफॉर्मर लगाने के बावजूद विद्युत आपूर्ति काफी कम है. ऐसी स्थिति में इन भारी मशीनों को चलाने के लिए प्रति घंटा आठ से 10 लीटर डीजल खर्च होता है. आखिर वे करें तो क्या करें.
प्रति घंटा 15 क्विंटल धान का चिउड़ा होता है तैयार
चिउड़ा व सत्तू मिल के मैनेजर अंजनी कुमार की मानें, तो इस ऑटोमेटिक मशीन से प्रति घंटा 15 क्विंटल धान का चिउड़ा तैयार होता है. इस बीच धान को गरम करने, चिउड़ा के लिए तैयार करने की मशीन में कहीं भी मजदूर की जरूरत नहीं के बराबर है. पूरी मशीन के चलने के दौरान बोरे में चिउड़ा पैक करने तथा पेना के दौरान मजदूर की जरूरत होती है. इसी प्रकार चिउड़ी या सत्तू बनाने के दौरान भी उसे भूंजने एवं पीसने के दौरान आदमी की जरूरत नहीं होती. सिर्फ मशीन के पास कच्च माल पहुंचाना तथा तैयारी के बाद पैकिंग के बाद मजदूर की जरूरत होती है.
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