एक शख्स, जिसके अंदर दिल नहीं, धड़कता है ''थियेटर''

छपरा / मुजफ्फरपुर : थियेटर इनका शौक नहीं, शोहरत व रुपये कमाने का माध्यम भी नहीं. बस एक जुनून, समाज बदलने का. दो वक्त की रोटी मिले या नहीं मिले, इनका संदेश लोगों के बीच जाना चाहिए. सामाजिक जागृति की लगन ऐसी कि उम्र के 92 वर्ष में भी अभिनय की वही तासीर. नाटकों के […]
छपरा / मुजफ्फरपुर : थियेटर इनका शौक नहीं, शोहरत व रुपये कमाने का माध्यम भी नहीं. बस एक जुनून, समाज बदलने का. दो वक्त की रोटी मिले या नहीं मिले, इनका संदेश लोगों के बीच जाना चाहिए. सामाजिक जागृति की लगन ऐसी कि उम्र के 92 वर्ष में भी अभिनय की वही तासीर. नाटकों के जरिये समाज सुधार की बात करने वाले यह शख्स आज थियेटर की किवदंती बन चुका है. भोजपुरी के शेक्सपीयर भिखारी ठाकुर ने इन्हें जो आदर्श दिया था,
उसे वे आज भी नाटकों के जरिये जिंदा रखे हुए हैं. यह शख्स छपरा के मढ़ौरा निवासी रामचंद्र मांझी हैं. इनकी सबसे बड़ी खासियत यह है कि भिखारी ठाकुर के नाटकों को अब भी गांव-गांव घूम कर प्रस्तुत कर रहे हैं. भिखारी ठाकुर के साथ सभी नाटकों में किया काम : रामचंद्र मांझी ने भिखारी ठाकुर के साथ उनके सभी नाटकों में काम किया है. ये 1940 के आसपास भिखारी ठाकुर के नाच पार्टी में शामिल हुए थे. इससे पहले इन्होने गाँव के ही दीनानाथ की नाच पार्टी में आठ-दस वर्ष की उम्र में शामिल हो कर नाच का प्रशिक्षण प्राप्त किया था. भिखारी ठाकुर के साथ इन्होंने बिदेसिया, बेटीबेचवा, गबरघिचोर, गंगास्नान,
भाई-बिरोध व बिधवा-बिलाप नाटकों की प्रस्तुति की. अब तक श्री मांझी देश के विभिन्न शहरों व गांवों में छह हजार से अधिक प्रस्तुति दे चुके हैं. श्री मांझी ने जब नाटकों में काम करना शुरू किया था तो इनका काफी विरोध हुआ. गांव में लोग इन्हें हिकारत की नजर से देखते थे. ऐसे कठिन समय में भी श्री मांझी ने सामाजिक परिवर्तन के लिए नाटक चुना.
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