एक शख्स, जिसके अंदर दिल नहीं, धड़कता है ''थियेटर''

Updated at : 10 Jul 2017 6:11 AM (IST)
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एक शख्स, जिसके अंदर दिल नहीं, धड़कता है ''थियेटर''

छपरा / मुजफ्फरपुर : थियेटर इनका शौक नहीं, शोहरत व रुपये कमाने का माध्यम भी नहीं. बस एक जुनून, समाज बदलने का. दो वक्त की रोटी मिले या नहीं मिले, इनका संदेश लोगों के बीच जाना चाहिए. सामाजिक जागृति की लगन ऐसी कि उम्र के 92 वर्ष में भी अभिनय की वही तासीर. नाटकों के […]

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छपरा / मुजफ्फरपुर : थियेटर इनका शौक नहीं, शोहरत व रुपये कमाने का माध्यम भी नहीं. बस एक जुनून, समाज बदलने का. दो वक्त की रोटी मिले या नहीं मिले, इनका संदेश लोगों के बीच जाना चाहिए. सामाजिक जागृति की लगन ऐसी कि उम्र के 92 वर्ष में भी अभिनय की वही तासीर. नाटकों के जरिये समाज सुधार की बात करने वाले यह शख्स आज थियेटर की किवदंती बन चुका है. भोजपुरी के शेक्सपीयर भिखारी ठाकुर ने इन्हें जो आदर्श दिया था,

उसे वे आज भी नाटकों के जरिये जिंदा रखे हुए हैं. यह शख्स छपरा के मढ़ौरा निवासी रामचंद्र मांझी हैं. इनकी सबसे बड़ी खासियत यह है कि भिखारी ठाकुर के नाटकों को अब भी गांव-गांव घूम कर प्रस्तुत कर रहे हैं. भिखारी ठाकुर के साथ सभी नाटकों में किया काम : रामचंद्र मांझी ने भिखारी ठाकुर के साथ उनके सभी नाटकों में काम किया है. ये 1940 के आसपास भिखारी ठाकुर के नाच पार्टी में शामिल हुए थे. इससे पहले इन्होने गाँव के ही दीनानाथ की नाच पार्टी में आठ-दस वर्ष की उम्र में शामिल हो कर नाच का प्रशिक्षण प्राप्त किया था. भिखारी ठाकुर के साथ इन्होंने बिदेसिया, बेटीबेचवा, गबरघिचोर, गंगास्नान,

भाई-बिरोध व बिधवा-बिलाप नाटकों की प्रस्तुति की. अब तक श्री मांझी देश के विभिन्न शहरों व गांवों में छह हजार से अधिक प्रस्तुति दे चुके हैं. श्री मांझी ने जब नाटकों में काम करना शुरू किया था तो इनका काफी विरोध हुआ. गांव में लोग इन्हें हिकारत की नजर से देखते थे. ऐसे कठिन समय में भी श्री मांझी ने सामाजिक परिवर्तन के लिए नाटक चुना.

अभाव में रहते हुए भी इन्होंने नाटक नहीं छोड़े. अब भी पहले की तरह नाटकों में सक्रिय हैं.
लोक कलाकार रामचंद्र मांझी ने भिखारी ठाकुर को किया जीवंत
92 वर्ष की उम्र में भी घूम-घूम कर करते हैं नाटकों की प्रस्तुति
1940 में भिखारी ठाकुर की मंडली से जुड़ कर करने लगे थे नाटक
मालिक ने मार कर सिखाया अभिनय
रामचंद्र मांझी कहते हैं कि जब मैं 11 साल का था तभी मालिक (भिखारी ठाकुर) की कंपनी से जुड़ गया था. जब तक वे ज़िंदा रहे उनके साथ काम करता रहा. वो जब सिखाते थे तो डांटते भी थे, मारते भी थे और दुलार भी करते थे. आज हम जो कुछ भी कर रहे हैं इसका कारण भी मालिक ही हैं. अगर मैंने उनके साथ काम नहीं किया होता तो शायद जीवन सफल नहीं हो पाता. मैं आज भी उनके नाटकों को करता हूं. लोग इसके लिए मुझे बुलाते हैं.
अब उठ रही पद्मश्री दिलाने की मांग
पुरस्कार व सम्मान से अलग रहने वाले इस शख्स पर सरकारी व गैर सरकारी संगठनों का ध्यान भी नहीं गया. लेकिन भिखारी ठाकुर रिप्रेटरी ट्रेनिंग व रिसर्च सेंटर ने जब इनके योगदानों को लेकर मुहिम चलायी तो अब संगीत नाटक अकादमी के अवार्डी नाटककार भी इन्हें पद्मश्री दिलाने की मांग कर रहे हैं. मढ़ौरा निवासी व रिसर्च सेंटर के निदेशक जैनेंद्र बताते हैं कि मैंने रामचंद्र मांझी के साथ कई नाटकों में काम किया है. भिखारी ठाकुर की तरह इनका भी मूल्यांकन अभी तक नहीं हुआ है.
संगीत नाटक अकादमी से सम्मानित परवेज अख्तर व रामचंद्र सिंह कहते हैं कि श्री मांझी ने नाटकों के जरिये समाज को बदलने में अहम भूमिका निभायी है. इन्हें पद्मश्री मिलना चाहिए.
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