चीनी-प्लास्टिक नहीं, इस बार बांस की राखी बांधिए; समस्तीपुर के कलाकार ने तैयार किया खास डिजाइन

Author Prakash kumar|Edited by Aaruni Thakur
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​बांस की राखी पर सजी मिथिला पेंटिंग, इस रक्षाबंधन हर कलाई पर बंधेगी संस्कृति

बांस की राखी पर मिथिला पेंटिंग उकेरते कुंदन कुमार रॉय | Prabhat Khabar Network

इस रक्षाबंधन पर समस्तीपुर से एक अनोखी पहल सामने आई है. बांस और मिथिला पेंटिंग से सजी इको-फ्रेंडली राखियां तैयार की गई हैं, जो पर्यावरण संरक्षण का संदेश देती हैं. यह पहल स्थानीय कला और आत्मनिर्भरता को बढ़ावा देती है.

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Mithila Painting Rakhi:  इस वर्ष रक्षाबंधन पर समस्तीपुर से एक ऐसी पहल सामने आई है, जिसमें मिथिला की लोक कला, पर्यावरण संरक्षण और स्वदेशी हस्तशिल्प का सुंदर संगम देखने को मिल रहा है. जिले के प्रेरक वक्ता और कला साधक कुंदन कुमार रॉय ने बांस और मिथिला पेंटिंग से सजी इको-फ्रेंडली राखियां तैयार की हैं, जो लोगों का ध्यान आकर्षित कर रही हैं.

इन राखियों का उद्देश्य केवल भाई-बहन के प्रेम का प्रतीक बनना नहीं, बल्कि स्थानीय कला और पर्यावरण संरक्षण का संदेश भी देना है.

बांस पर सजी मिथिला पेंटिंग

भारतीय संस्कृति में बांस को समृद्धि, वंश वृद्धि और शुभता का प्रतीक माना जाता है. इसी परंपरा को आधार बनाते हुए कुंदन कुमार रॉय ने राखी का मुख्य आधार बांस को बनाया है.

इन राखियों पर बेहद बारीकी से मिथिला पेंटिंग की गई है. पारंपरिक लोक कला की यह झलक इन्हें साधारण राखी से अलग पहचान देती है और इन्हें एक कलात्मक स्मृति-चिह्न का रूप प्रदान करती है.

चुनौती को बनाया अपनी ताकत

इस पहल की सबसे प्रेरक बात यह है कि कलाकार कुंदन कुमार रॉय स्वयं वर्णान्ध (Color Blind) हैं. रंगों की सामान्य पहचान में कठिनाई होने के बावजूद उन्होंने अपनी इस चुनौती को कभी बाधा नहीं बनने दिया.

उन्होंने अपनी लगन और कला के दम पर ऐसी आकर्षक राखियां तैयार की हैं, जो बाजार में उपलब्ध प्लास्टिक और आयातित राखियों से अलग पहचान बना रही हैं.

स्थानीय कला और आत्मनिर्भरता को मिलेगा बढ़ावा

कुंदन कुमार रॉय का मानना है कि रक्षाबंधन जैसे त्योहारों पर स्वदेशी और पर्यावरण अनुकूल उत्पादों को अपनाने से स्थानीय कलाकारों और कारीगरों को भी नया बाजार मिलेगा.

उनकी यह पहल मिथिला कला के संरक्षण के साथ-साथ आत्मनिर्भर भारत की भावना को भी मजबूती देती है.

"यह सिर्फ राखी नहीं, हमारी पहचान है"

अपनी इस पहल पर कुंदन कुमार रॉय कहते हैं,

"यह सिर्फ राखी नहीं, हमारी परंपरा, सभ्यता, संस्कृति और पहचान का प्रतीक है. हमारा प्रयास है कि आधुनिकता की दौड़ में हम अपनी लोक कलाओं को न भूलें. बांस की राखियों पर मिथिला पेंटिंग ने इनकी सुंदरता और सामाजिक महत्व दोनों को बढ़ाया है."

उन्होंने कहा कि यह पहल स्थानीय हुनर को प्रोत्साहित करने और पर्यावरण के अनुकूल उत्पादों के उपयोग को बढ़ावा देने की दिशा में एक छोटा लेकिन महत्वपूर्ण प्रयास है.

इस रक्षाबंधन पर उनकी बनाई स्वदेशी राखियां भाई-बहन के स्नेह के साथ-साथ मिथिला की सांस्कृतिक विरासत और पर्यावरण संरक्षण का संदेश भी लोगों तक पहुंचाएंगी.

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