Bamboo Cycle: Vishwakarma of the village: गांव के विश्वकर्मा : पांच सौ रुपये खर्च कर बना डाली बांस की साइकिल
Author Prabhat khabar news desk
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Bamboo Cycle: Vishwakarma of the village: संजय बताता है कि 500 रुपये खर्च कर 25 दिनों की मेहनत के बाद उसने साइकिल को तैयार किया. इसमें उसने अपनी पुरानी साइकिल की रिम को मरम्मत कर उपयोगी बनाया.
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Bamboo Cycle: Vishwakarma of the village पुरानी टूटी साइकिल में किया जुगाड़ टेक्नोलॉजी का प्रयोग,बांस शिल्प कला ने साइकिल की सुंदरता और बढ़ा दी, ये गुण साइकिल के फ्रेम में तब्दील हो जाते हैं. बैम्बिक साइकिल अब सांस्कृतिक विरासत के बारे में पर्यटकों को शिक्षित कर और पर्यावरण के अनुकूल विकल्प चुनकर संधारणीय पर्यटन को बढ़ावा देने पर अपना ध्यान केंद्रित कर रहा है. ऐसे में समस्तीपुर के ”गांव के विश्वकर्मा” संजय को प्रोत्साहित करने की जरूरत है.
Bamboo Cycle: Vishwakarma of the village :
प्रकाश कुमार, समस्तीपुर, जिले के विभूतिपुर प्रखंड स्थित सिरसी वार्ड दो का संजय साजन बांस की साइकिल बना इन दिनों सुर्खियों में है. वह बताता है कि छोटे-मोटे कार्यक्रमों में डेकोरेशन का काम करते हैं. काम के सिलसिले में आने जाने के लिए उसके पास पुरानी टूटी साइकिल थी. आने-जाने में जब समस्या उत्पन्न होने लगी, तो नयी साइकिल लेने की सोची. गरीबी के कारण बाजार की ओर रुख न कर जुगाड़ टेक्नोलॉजी से बांस के फ्रेम के सहारे साइकिल बना सबको हैरान कर दिया. संजय बताता है कि 500 रुपये खर्च कर 25 दिनों की मेहनत के बाद उसने साइकिल को तैयार किया. इसमें उसने अपनी पुरानी साइकिल की रिम को मरम्मत कर उपयोगी बनाया.Bamboo Cycle:
Vishwakarma of the village रेसिंग में भी किया जा सकता है उपयोग
संजय ने दावा किया है कि बाजारों में बिकने वाली अन्य साइकिल की तुलना में यह ज्यादा बेहतर और आरामदायक है. इसका उपयोग रेसिंग के लिए भी किया का सकता है. इस युवा ने विलुप्त होती बांस कला को फिर से जीवित करने और बेरोजगार युवाओं को रोजगार से जोड़ने के उद्देश्य से बांस की साइकिल का निर्माण किया है. इसमें खास बात यह है कि साइकिल बनाने में हस्तशिल्प का प्रयोग किया गया है.
Bamboo Cycle: Vishwakarma of the village बांस की साइकिल फिलीपींस में ला रही हैं बदलाव
उत्क्रमित मध्य विद्यालय लगुनियां सूर्यकंठ के एचएम सौरभ कुमार ने बताया कि बांस की साइकिल फिलीपींस में बदलाव ला रही है. बाम्बिके रिवोल्यूशन साइकिल्स के संस्थापक ब्रायन बेनिटेज मैक्लेलैंड के लिए यह खोज जीवन बदलने वाली थी. मूल रूप से फिलीपींस के रहने वाले ब्रायन को 2007 में अफ्रीका की यात्रा के दौरान ये साइकिल मिली. उन्हें तुरंत एहसास हुआ कि यह नवाचार उनके अपने देश में विकसित किया जा सकता है. वहां बांस प्राकृतिक रूप से प्रचुर मात्रा में है. उन्होंने 2009 में अपनी पहली साइकिल बनायी. श्री कुमार बताते हैं कि बांस में ऐसे गुण होते हैं जो साइकिल चलाने के लिए एकदम सही होते हैं. ये गुण साइकिल के फ्रेम में तब्दील हो जाते हैं. बैम्बिक साइकिल अब सांस्कृतिक विरासत के बारे में पर्यटकों को शिक्षित कर और पर्यावरण के अनुकूल विकल्प चुनकर संधारणीय पर्यटन को बढ़ावा देने पर अपना ध्यान केंद्रित कर रहा है. ऐसे में समस्तीपुर के ”गांव के विश्वकर्मा” संजय को प्रोत्साहित करने की जरूरत है.आपके शहर में
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