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भिखारी ठाकुर आधुनिक बोध के कवि, अभिनेता, गायक व नाट्यशिल्पी : प्रो भारती

Updated at : 05 Dec 2025 6:56 PM (IST)
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भिखारी ठाकुर आधुनिक बोध के कवि, अभिनेता, गायक व नाट्यशिल्पी : प्रो भारती

मध्य प्रदेश भोजपुरी अकादमी, भोपाल द्वारा ललित कला महाविद्यालय, जबलपुर में बिहार के तीन कालजयी रचनाकारों पर आधारित संगीत, नृत्य व संगोष्ठी का आयोजन किया गया.

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ललित कला महाविद्यालय, जबलपुर में संगोष्ठी का हुआ आयोजन वक्ता के रूप में जिले के साहित्यकार व संस्कृति विद प्रो ओमप्रकाश भारती थे आमंत्रित सहरसा. मध्य प्रदेश भोजपुरी अकादमी, भोपाल द्वारा ललित कला महाविद्यालय, जबलपुर में बिहार के तीन कालजयी रचनाकारों पर आधारित संगीत, नृत्य व संगोष्ठी का आयोजन किया गया. इस अवसर पर वक्ता के रूप में जिले के साहित्यकार व संस्कृति विद प्रो ओम प्रकाश भारती आमंत्रित थे. डॉ भारती के संभाषण के साथ गुरु मोनालिसा घोष कोलकाता ने अपने शिष्यों के साथ नृत्य की प्रस्तुति दी. डॉ ओम प्रकाश भारती ने कहा कि विद्यापति प्रेम, शृंगार के साथ लोक चेतना के चितेरे थे. कई अर्थों में भक्ति काल की नींव उन्होंने रखी थी. महेंद्र मिश्र व भिखारी ठाकुर का जन्म एक ही समय 1887 में छपरा जिले में हुआ था. यह समय भोजपुरी औपनिवेशिक दमन का काल था. बटोही, गिरमिटिया, रखेलिन शब्दों का प्रचलन औपनिवेशिक काल में अप्रवासियों व विस्थापित भोजपुरी भाषियों की भावनात्मक क्षति का परिणाम था. मातृभूमि से बिछुड़ने की पीड़ा से ही बिदेसिया, बटोहिया जैसे नाट्य, गीत लोक हृदय से प्रस्फुटित हुए. यह सृजन क्रिया-प्रक्रिया जितनी रोमांचक है, उतनी ही दारुण. 1857 के गदर के बाद ब्रितानी सरकार द्वारा जो भू-व्यवस्था पूर्वी उत्तर प्रदेश व पश्चिमी बिहार के लोगों पर थोपी गयी. उनका परिणाम इतना भयावह हुआ कि उन्नीसवीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध तक इस अंचल के पच्चीस-तीस प्रतिशत लोगों को रोज़ी-रोटी की तलाश में घर-परिवार, गांव, संस्कृति को छोड़कर पलायन के लिए मजबूर होना पड़ा. महेंद्र मिश्र ने अपने गीतों के माध्यम से भक्ति, शृंगार के साथ अंग्रेजी सरकार का प्रतिरोध किया. पूर्वी जैसे लोक छंदों को नई ऊंचाई दी. भिखारी ठाकुर आधुनिक बोध के कवि, अभिनेता, गायक, नाटककार व नाट्यशिल्पी थे. औपनिवेशिक कालीन भोजपुरिया समाज के विस्थापन उससे उपजी सामाजिक विसंगतियों को भिखारी ठाकुर ने प्रमुखता से अपनी रचनाओं के माध्यम से उद्-घाटित किया. उनका नाट्य प्रयोग भारतीय रंगमंच का नावाचार था. कबीर के बाद, हिन्दी प्रदेश में वे एक ऐसे चिंतक हुए, जिन्होंने वहां की सामाजिक समस्याओं को अपनी रचनाओं में प्रखरता से उद्घाटित किया.

डिस्क्लेमर: यह प्रभात खबर समाचार पत्र की ऑटोमेटेड न्यूज फीड है. इसे प्रभात खबर डॉट कॉम की टीम ने संपादित नहीं किया है

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