पॉक्सो मामले में अभियुक्त को छह वर्षों की सजा, 20 हजार रुपये का जुर्माना

Published by :Dipankar Shriwastaw
Published at :17 Apr 2026 6:59 PM (IST)
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पॉक्सो मामले में अभियुक्त को छह वर्षों की सजा, 20 हजार रुपये का जुर्माना

पॉक्सो मामले में अभियुक्त को छह वर्षों की सजा, 20 हजार रुपये का जुर्माना

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सहरसा . व्यवहार न्यायालय में एक महत्वपूर्ण पॉक्सो मामले में फैसला सुनाते हुए जिला अपर सत्र न्यायाधीश सह स्पेशल पॉक्सो न्यायाधीश राकेश कुमार राकेश की अदालत ने अभियुक्त को दोषी ठहराया है. विशेष लोक अभियोजक शिवेंद्र प्रसाद द्वारा प्रभावी पैरवी के बाद न्यायालय ने स्पेशल पॉक्सो में यह निर्णय दिया. न्यायालय ने अभियुक्त सोनम कुमार यादव उर्फ प्रियदर्शी राज को भारतीय दंड संहिता की धारा 367 के तहत दोषी पाते हुए छह वर्ष के सश्रम कारावास की सजा सुनायी. साथ ही 20 हजार रुपये का जुर्माना लगाया. जुर्माना नहीं देने की स्थिति में अभियुक्त को अतिरिक्त दो वर्ष का सश्रम कारावास भुगतना होगा. इसके अलावा न्यायालय ने पीड़िता के लिए कुल चार लाख रुपये का मुआवजा निर्धारित किया है. जिसमें दो लाख रुपये अभियुक्त द्वारा एवं दो लाख लाख रुपये जिला विधिक सेवा प्राधिकरण द्वारा दिये जाने का आदेश दिया. मामले के आवेदक एवं पीड़िता के पिता शंकर यादव ने अपने आवेदन में बताया कि 31 मई 2022 को उनकी पुत्री सुबह शौच के लिए घर से निकली थी. लेकिन रात 10 बजे तक वापस नहीं लौटी. काफी खोजबीन के बाद जानकारी मिली कि अभियुक्त सोनम कुमार यादव उसे अपने घर ले गया है. जब वे उसके घर पहुंचे तो वहां पर परिजनों द्वारा गाली-गलौज, मारपीट की गयी एवं केस करने पर जान से मारने की धमकी दी गयी. न्यायालय के आदेश में उल्लेख किया गया है कि पीड़िता ने धारा 164 के तहत बयान दर्ज कराने के बाद वापस न्यायालय में उपस्थित नहीं हुई. अनुसंधानकर्ता के अनुसार वह अपने पिता के घर से दोबारा भाग गयी. अब तक उसका कोई पता नहीं चल पाया है. इस संबंध में सदर थाना सहरसा में 17 अगस्त 2025 को मामला दर्ज किया गया. लेकिन इसके बावजूद पुलिस पीड़िता का पता लगाने में विफल रही. न्यायालय के समक्ष यह भी तथ्य आया कि प्राथमिकी दर्ज होने के बाद 28 अक्टूबर 2025 को पीड़िता जेल में अभियुक्त से मिली. जिसका उल्लेख अनुसंधानकर्ता सब इंस्पेक्टर दिलीप कुमार सिंह ने अपने दैनिक केस डायरी में किया है. इस परिस्थिति पर न्यायालय ने अप्रत्यक्ष रूप से जांच प्रक्रिया पर भी प्रश्नचिह्न उठाया. मामले में कुल पांच गवाहों की गवाही हुई. जिनमें अनुसंधानकर्ता एवं एक शिक्षक भी शामिल थे. इस फैसले को पॉक्सो मामलों में न्यायिक प्रक्रिया के एक महत्वपूर्ण उदाहरण के रूप में देखा जा रहा है.

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