इंसानियत को तो जिंदा रखना ही होगा...

इंसानियत को तो जिंदा रखना ही होगा… डॉक्टरों को सिर्फ व्यवसाय की नहीं, रखनी होगी सेवा भावना भीऑपरेशन व आइसीयू के नाम पर मरीजों को लूटने का लगता रहा है आरोपप्रतिनिधि, सहरसा मुख्यालयकहते हैं कि डॉक्टर दूसरे भगवान होते हैं, क्योंकि वे जाते मरीजों को जीवन दान देते हैं. लेकिन आधुनिकता की ओर जाते समय […]
इंसानियत को तो जिंदा रखना ही होगा… डॉक्टरों को सिर्फ व्यवसाय की नहीं, रखनी होगी सेवा भावना भीऑपरेशन व आइसीयू के नाम पर मरीजों को लूटने का लगता रहा है आरोपप्रतिनिधि, सहरसा मुख्यालयकहते हैं कि डॉक्टर दूसरे भगवान होते हैं, क्योंकि वे जाते मरीजों को जीवन दान देते हैं. लेकिन आधुनिकता की ओर जाते समय के साथ यह परिभाषा अब बदलती जा रही है. डॉक्टर व्यवसाय व बदनामी के पर्याय बनते जा रहे हैं. आये दिन डॉक्टरों के क्लिनिक व नर्सिंग होम पर हंगामा, पथराव व मारपीट तक की खबरें आती रहती है. यदि धुआं उठता है तो आग के होने की भी संभावना निश्चित बनी होती है. लापरवाही जैसा शब्द भी डॉक्टरों के साथ जुड़ता चला गया है. खासकर आइसीयू व ऑपरेशन की जरूरत वाले मरीजों में डॉक्टरों के प्रति जितना भरोसा होता है. उससे कहीं अधिक लूटने की बात भरी होती है. मरीजों में पनपे ऐसी भावना को बदलने व लोगों का विश्वास जीतने की जरूरत बन पड़ी है. बड़ा लक्ष्य होता है डॉक्टर बनना किशोरावस्था के अध्ययनकाल से ही छात्र व छात्राओं के लक्ष्य में डॉक्टर बनने की चाहत होती है. किताबों में आज भी पत्र लेखन में पहला विषय यही समाहित है. तब यह कहा जाता है कि वह बड़ा होकर डॉक्टर बनेगा. जिसके लिए वह लगातार प्रयास कर रहा है. डॉक्टर बनने के बाद वह गरीबों की मुफ्त सेवा करेगा व उसकी फीस न्यूनतम होगी. लेकिन लक्ष्य को प्राप्त करने के साथ उसका लक्ष्य विपरित हो जाता है. उनके बीच मरीजों के अमीर व गरीब होने की भावना समाप्त हो जाती है. उनसे मिलने के लिए भी लंबी कतार लगानी होनी होती है. मुफ्त इलाज की बात तो दूर, फीस में रियायत तक नहीं हो पाती है. ऐसे में बचपन के सारे लक्ष्य किताब के पन्नों के साथ ही बंद हो जाते हैं. व्यवसाय का पर्याय है डॉक्टरीवर्तमान समय में डॉक्टरी किसी भी शहर में व्यवसाय का सबसे बड़ा पर्याय बन गया है. डॉक्टरों के घर हों या क्लिनिक. उनका नर्सिंग होम हो या अस्पताल. आम लोग या मरीजों की नजर में व्यवसाय की सबसे बड़ी दुकान के रूप में देखे जाने लगा है. डॉक्टरों के द्वारा निर्धारित किए गए फीस के अनुसार ही मरीज चिकित्सक का चयन करते हैं. निश्चित रूप से यह स्वस्थ समाज के लिए चिंता की बात है. आज शहर में कई ऐसे भी कथित डॉक्टरों ने अपना अस्पताल खोल रखा है. जिनके पास एमसीआइ का कोई प्रमाण पत्र नहीं है. जिनके विरुद्ध यदा-कदा आवाजें भी उठती हैं. लेकिन धन व प्रभाव के बल पर उसे दबा दिया जाता है और मरीज के जीवन से खिलवाड़ होने का सिलसिला यूं ही चलता रहता है. जांच व एक्स-रे अनिवार्यवर्तमान व्यवसायिक चिकित्सा पद्धति में विभिन्न प्रकार के जांच व एक्स-रे अनिवार्य हो गए हैं. वह भी डॉक्टर द्वारा उपलब्ध कराये गए पते (कार्ड) पर ही. इस सिस्टम ने डॉक्टरों पर से विश्वास खोने में महती भूमिका निभायी है. दूसरा डॉक्टरों द्वारा लिखे जाने वाले अधिक से अधिक दवाओं ने भी चिकित्सा पद्धति को बदनाम किया है. दवाएं का भी डॉक्टरों के निजी मेडिकल में ही मिलना संदेह को ज्यादा मजबूत करता है. नॉरमल डिलीवरी को सिजेरियन करने की परंपरा यहां काफी हद तक घर कर चुकी है. ऑपरेशन अथवा आइसीयू में भरती होने की स्थिति में तो मरीज को कई बार अपना सब कुछ दावं पर लगाना होता है. बचानी होगी मानवता कोसमाज में सम्मान की दृष्टि से देखे जाने वाले डॉक्टरों को मानवता का ख्याल रखना होगा. उसे बचाना होगा. बेवजह जांच, एक्स-रे, महंगी दवाओं से मरीजों को मुक्त करना होगा. उन्हें नया जीवन देने के बदले उसे कंगाल बनने से रोकना होगा. उसकी आह के बदले उसकी दुआएं लेने की ओर कदम बढ़ाना होगा. डॉक्टरों के सफेद गॉन पर दाग के लग रहे गंदे छींटे को साफ करना होगा. नहीं तो धरती के दूसरे भगवान से जड़ और जमीन से जुड़े लोगों का भरोसा टूट जायेगा. वे एक और बदनामी वाले शब्द के पर्याय बन जायेंगे.
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