बयानों के वार में पीछे छूट रहा विकास का मुद्दा

बयानों के वार में पीछे छूट रहा विकास का मुद्दा नेताओं की सभा में आरोप-प्रत्यारोप के अलावा नहीं हो रही काम की बातेंप्रतिनिधि/ सहरसा नगर पांचवें व अंतिम चरण के लिए पांच नवंबर को मत डाला जाना है. इसके लिए सभी दलों व सभी प्रत्याशियों ने अपने-अपने तरीकों से पूरी ताकत झोंक दी है. अभी […]
बयानों के वार में पीछे छूट रहा विकास का मुद्दा नेताओं की सभा में आरोप-प्रत्यारोप के अलावा नहीं हो रही काम की बातेंप्रतिनिधि/ सहरसा नगर पांचवें व अंतिम चरण के लिए पांच नवंबर को मत डाला जाना है. इसके लिए सभी दलों व सभी प्रत्याशियों ने अपने-अपने तरीकों से पूरी ताकत झोंक दी है. अभी उन ताकतों में बयानों का वार ही प्रबल होता जा रहा है. पार्टियों का बिहार मिशन कहीं लोप सा हो गया है. शीर्ष नेता यह नहीं बता रहे कि उनके आने से जिले की कौन-कौन सी समस्या समाप्त हो जायेगी. क्षेत्र की तसवीर व क्षेत्र के लोगों की तकदीर कैसे बदल जायेगी. वे अपनी ओर से होने वाली उपलब्धि को बताने की बजाय दूसरों के आने से होने वाली हानि को गिना रहे हैं. धर्म, संप्रदाय व जाति तक की बातें करने से नहीं चूक रहे हैं. वोटों की गोलबंदी करने के लिए शीर्ष नेताओं केे बयानों के वार के बीच क्षेत्र के विकास का मुद्दा कहीं पीछे छूटता जा रहा है. सरकार बनने और बनाने की जद्दोजहद में वोटरों में आपसी तकरार बढ़ता जा रहा है. – ड्रेनेज व आरओबी की चर्चा नहींजिले भर में सड़क, बिजली, स्कूल भवन, अस्पताल की व्यवस्था में यदि सुधार हुआ है तो इससे कहीं अधिक मूलभूत सुविधाएं नहीं मिल पायी है. शहरी क्षेत्र के लिए जलजमाव अभिशाप है. ड्रेनेज सिस्टम का प्रस्ताव आया. डिजाइनिंग व डीपीआर भी तैयार हुई, लेकिन इसे अमलीजामा नहीं पहनाया जा सका. बरसात के अलावा जब भी आसमान से बूंदे टपकती है. तब-तब यह अखबारों की कहानी बनती है. लोग जनप्रतिनिधियों को नकाम बताते हैं, लेकिन चुनावी समय में भी इस समस्या के समाधान का कहीं कोई जबाव नहीं मिल रहा है. रोजगार की दृष्टि से बैजनाथपुर पेपरमिल भी जनप्रतिनिधियों की विफलता ही बताता है. बंगाली बाजार का ओवरब्रिज तो देश भर में क्षेत्र की जग हंसायी का विषय बनकर रह गया है. इसके नहीं बन पाने से प्रमंडलीय मुख्यालय का गति थम गयी है. पर्यटन की दृष्टि से जिले की पहचान बनने वाले मत्स्यगंधा की दुर्दशा भी किसी से छिपी नहीं है. 15 वर्षों में सुंदर व मनोरम झील की दशा लौटायी नहीं जा सकी. – मखाना-मछली को उद्योग का दर्जाकहते हैं कि जिले की पहचान मछली मखाना व पान से है. जिसमें से पान की खेती तो अब नहीं होती है. केंद्र व राज्य सरकार की लापरवाही से शेष बचे दो पहचान भी दम तोड़ते नजर आते हैं. यदि बिहार भारत को चौथा सबसे बड़ा मछली उत्पादक राज्य बनाता है तो कोसी क्षेत्र का भी उसमें अहम योगदान है. कोसी नदी, सीपेज वाटर व जिले भर के सैकड़ों तालाबों में 50 से अधिक प्रकार की मछलियां होती हैं, लेकिन मत्स्यपालन से जुड़े लोगों को किसी भी सरकार से किसी तरह की सुविधा नहीं मिल पायी है. यहां मखाना व गुड़ (शक्कर) भी बड़े पैमाने पर तैयार होता है. देश के दूसरे हिस्सों में भेजा जाता है, लेकिन उद्योग का दर्जा नहीं देने व सरकारी सहायता नहीं मिलने से ये कामगार हतोत्साहित हो रहे हैं. जिले का नवहट्टा, महिषी व सिमरी बख्तियारपुर प्रखंड बाढ़ प्रभावित इलाका है. केंद्र व राज्य की सरकार बाढ़ के स्थायी समाधान पर कुछ भी बोलने से परहेज कर रही है. फोटो- इलेक्शन 1 व 2- बारिश के दिनों में सड़क की दुर्गति व रोज जाम से कराहता है सहरसा
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